Srishti Khanda Extracted Page 61

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-61

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Sanskrit Original

श्रीफद्ममहापुरण सा तु श्रीर्ब्रह्मणा प्रोक्ता देवि गछस्व केशवम् । मयादत्तं पतिं प्राप्य मोदस्व शाश्वतीः समाः ॥६७॥ पश्यतां सर्वदेवानां गता वक्षस्थलं हरेः । ततो वक्षस्थलं प्राप्य देवं वचनमत्रबीत् ॥६८॥ नाहे त्याज्या सदा देव सदैवादेशकारिणी। वक्षस्थले निवत्स्यामि सर्वस्य जगतः प्रिय ॥६९॥ वतोऽवलोकिता देवा विष्णुवक्षस्थलस्थया । लक्ष्म्या राजेंद्र सहसा परां निर्वृतिमागताः ॥७०॥ उद्वेगं च परं जग्मु दैत्या विष्णुपरादमुखाः । त्यक्तास्तुदानवा लक्ष्म्या विप्रचित्तिपुरोगमाः ॥७ १॥ तस्ते जगुहुर्दैत्या धन्वंतरिकरस्थितम्। अमृतं तंमहावीर्य्या दैत्याः पापसमन्विताः॥७२॥ मायया लोभ्रयित्वा तु विष्णुः ख्रीरूपसंश्रयः। आगत्य दानवान्ग्राह दीयतां मे कमंडलुः ॥७३॥ युष्माकं वशगा भूत्वा स्थास्यामि भवतां गृहे। तां दृष्ट्वा रूपसपन्नां नारीं त्रैलोक्यसुंदरीम् ॥७४॥ प्रार्थयानास्सुवपुषं लोभोपहतचेतसः। दत्त्वामृतं तदा तस्यै ततोपश्यन्त तेऽग्रतः ॥७५॥ दानवेभ्यस्तदाऽ दाय देवेभ्यः प्रददेमृतं । ततः पपुः सुरगणाः शक्राद्यास्तत्तदामृतम्॥७६॥ ठद्यतायुधनिस्त्रिशा दैत्यास्तांस्ते समभ्ययुः । पीतेऽमृते च बलिभिर्जिता दैत्यचमूस्ततः ॥७७॥ वध्यमाना दिशो भेजुः पातालं विविशुश्च ते । ततो देवा मुदा युक्ताःशंखचक्रगदाधरम् ॥७८॥ प्रणिपत्य यथापूर्व प्रययुसतेत्रिविष्टपम्। ततःप्रभृति ते भीष्म स्त्रीलोला दानवाभवन् ॥७९॥ अपध्यातास्तु कृष्णेन गतास्ते तु रसातलम् । ततः सूर्यः प्रसन्नाभः प्रययौ स्वेन वर्त्मना ॥८०॥ जज्वालभगवांश्रोच्चैश्रारुदीप्ति हुताशनः। धर्मे च सर्वभूतानां तदामतिरजायत॥८ १॥ EE केशव के पाम जाओ, मेरे द्वार प्रदत्त पति को ग्राप्त करके निरन्तर आनन्दित रहो, इसतरह से ब्रह्माजी के कहने पर श्रीदेवी, सबों के सामने ही श्रीहरि के वक्षःस्थल में प्रवेश कर गयीं । उसके वाद श्रीहरि के वक्षःस्थल को प्राप्त करके श्रीदेवी ने कहा ॥६७-६८॥ है सबो के प्रिय देव ! आप मेरा कभी भी परित्याग नहीं करेंगे; आपकी आज्ञा का सदा पालन करने वाली मैं आपके वक्षःस्थल में निवास करूँगी ॥६९॥ हे राजेन्द्र ! भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में स्थित लक्ष्मीजी के द्वारा देखे जाने पर सभी देवता परम कल्याण को प्राप्त कर लिए ॥७०॥ भगवान् विष्णु के विरुद्ध रहने वाले दैत्य अत्यधिक उद्विग्न हो गये । लक्ष्मीजी ने विप्रचित्ति इत्यादि दैत्यों का परित्याग कर दिया ॥७१॥ उसके बाद महा पराक्रमी पापी दैत्या ने धन्वन्तरि के हाथ में विद्यमान अमृत को ले लिया ॥७२॥ स्री का रूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु उन दैत्यों को अपनी माया से मोहित करके उनके पास आये और कहे कि आपलोग मुझे अमृत का कमण्डलु, दे दीजिये ॥७३॥ आपलोगों की वशवर्तिनी बनकर आपलोगों के गृह में निवास करूंगी । उस रूप सम्पन्न त्रैलोक्य सुन्दरी नारी को देखकर ॥७४॥ लोभ से मोहित अन्तःकरण वाले वे दैत्य उसके शरीर को प्राप्त करना चाहे और ठसको अमृत देकर, उन सबों ने अपने सामने देखा कि उस अमृत को दानवों से लेकर उसने देवताओं को दे दिया । उसके बाद इन्द्र आदि देवताओं ने उस अमृत को पी लिया ॥७५-७६॥। तत्पश्चात् दैत्य निश आदि आयुध धारण करके देवताओं से युद्ध करने लगे । अमृत पीकर बलवान् बने हुए देवताओं द्वार दैत्यसेना पराजित हो गयी ॥७७॥ देवताओं द्वारा मारे हुए दैत्य विभिन्न दिशाओं में भागकर पाताल में प्रवेश कर गये। टसके पश्चात प्रसत्र होकर देवताओं ने शङ्क, चक्र तथा गदाधारी ॥७८॥ श्रीभगवान् को साष्टाङ्ग प्रणाम करके पहले के ही समान स्वर्ग लोक में चले गये । हे भीष्मजी ! उसी समय से वे दानव स्त्री के लोभी हो गये ॥७९॥ श्रीमगवान् के द्वारा द्वेष की दृष्टि से देखे गये वे रसातल में चले गये । उसके बाद सूर्य की प्रभा स्वच्छ हो गयी और वे अपने मार्ग से चलने लगे ॥८०॥ भगवान् हुताशन (अग्नि) मनोहर प्रकाश के साथ जोर-जोर से जलने लगे ।

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