Srishti Khanda Extracted Page 60
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-60
Sanskrit Original
ततः शीतांशुरभवद्देवानां प्रीतिदायकः । ययाचे शंकरो देवो जटाभूषणकृन्मम ॥५२॥ भविष्यति न संदेहो गृहीतोऽयं मया शशी । अनुमेने च तं ब्रह्मा भूषणाय हरस्य तु॥५३॥ ततोविषं समुत्पन्नं कालकूटं भयावहम् । तेन चैवार्दितास्सवें दानवाःसह दैवतैः ॥५४॥ महादेवेन तत्पीतं विषं गृह्य यदृच्छय। तस्य पानान्नीलकंठस्तदा जातो महेश्वरः ॥५५॥ पीतावशेषं नागास्तु क्षीराब्धेस्तु समुत्थितम् । ततो धन्वंतरिर्जात: श्वेतांबरधरः स्वयम् ॥५६॥ विभ्रत्कमंडलुं पूर्णममृतस्य समुत्थितः । ततः स्वस्थमनस्कास्ते वैद्यराजस्य दर्शनात् ॥५७॥ ततश्चाश्वः समुत्पन्नो नागश्चैरावतस्तथा । ततःस्फुरत्कांतिमती विकासि कमले स्थिता ॥५८॥ श्रीदेवी पयसस्तस्मादुत्थिता धृतपंकजा । तां ु ष्टवुर्मुदायुक्ताः श्रीसूक्तेन महर्षयः ॥५९॥ विश्वावसुमुखास्तस्या गंधर्वाः पुरतो जगुः । घृताचीप्रमुखास्तत्र नन्ृतुश्चाप्सरोगणाः ॥६ ०॥ गंगाद्या: सरितस्तोयैः स्नानार्थमुपतस्थिरे । दिग्गजा हेमपात्रस्थमादाय विमलं जलमू॥६ १॥ स्नापयांचक्रिरे देवीं सर्वलोकमहेश्वरीम् । क्षीरोदस्तु स्वयं तस्यै मालामम्लानपंकजाम् ॥६ २॥ ददौ विभूषणान्यंगे विश्वकर्मा चकार ह । दिव्यमाल्यांबरधरां स्नातां भूषणभूषिताम् ॥६३॥ इंदराद्याश्चामरगणा विद्याधरमहोरगाः । दानवाश्च महादैत्या राक्षसाःसह गुह्णाकैः ॥६ ४॥ कन्यामभिलषन्तिस्म ततो ब्रह्मा उवाच ह । वासुदेवत्वमेवैनां मया दत्तां गृहाण वै ॥६५॥ देवाश्च दानवाश्चैव प्रतिषिद्धा मया त्विह । तुष्टोहं भवतस्तावदलौल्येनेह कर्मणा ॥६६॥ साठ करोड़ अप्सरायें निकलीं जो देवताओं तथा दानवों के लिए सामान्य थीं । पुण्य कर्म करने के द्वारा वे पहले ही सामान्य (वाराङ्गना) बना दी गयी थीं ॥५१॥ उसके बाद देवताओं को प्रसन्न करने वाले चन्द्रमा निकले । उसको अपनी जटा का भूषण बनाने के लिए शङ्करजी ने माँग लिया ॥५२॥ उन्होंने कहा निःसन्देह चन्द्रमा मेरी जटा का भूषण होगा, अतएव इसे मैंने ले लिया, और उसको शङ्करजी का भूषण बनाने के लिए ब्रह्माजी ने समर्थन कर दिया॥५३॥ उसके बाद कालकूट हलाहल नामक विष निकला । उसने सभी देवों तथा दैत्यों को दुःखी बना दिया॥५४॥ उसको यदृच्छा वशात् शङ्करजी ने लेकर पी लिया । उसको पीने से शङ्करजी नीलकण्ठ हो गये ॥५५॥ क्षीरसागर से निकले हुए तथा शङ्करजी के पीने से बचे हुए विष को नागों ने पी लिया उसके बाद श्वेतवख धारण करने वाले धन्वन्तरि प्रकट हुए ॥५६॥ वे अमृत से भरे हुए कमण्डलु को धारण किए हुए थे । वैद्यराज धन्वन्तरि के देखने मात्र से सभी देवता और दैत्य स्वस्थ मन वाले हो गये ॥५७॥ उसके बाद घोड़ा (उच्चैःश्रवा) और ऐगवत हाथी प्रकट हुए । तदनन्तर विकसित कमल पर बैठी हुयी कान्ति सम्पन्न श्रीदेवी उस दुग्ध सागर से उत्पन्न हुयी । वे अपने हाथ में कमल धारण किए थीं । महर्षियों ने श्रीदेवी की स्तुति की ॥५९॥ उनके सामने विश्वावसु इत्यादि गन्धर्वो ने गायन किया और घृताची इत्यादि अप्सराओं ने नृत्य किया ॥६०॥ गङ्गा आदि नदियाँ उनको स्नान कराने के लिए उपस्थित हो गयीं । दिग्गज सुवर्ण कलश में पवित्र जल लेकर ॥६१॥ समस्त लोकों की स्वामिनी उस देवी को स्नान कराये । स्वयं क्षीरसागर ने उनको कभी नहीं कुम्हलागे वाले कमलों की माला प्रदान किया ॥६२॥ विश्वकर्मा ने उनके अङ्गोँ में भृषणां को सजा दिया । स्नान करके दिव्य वस्नो तथा भूषणो को धारण करने वाली ॥६३॥। कन्या श्रीदेवी को इन्द्र इत्यादि देवगण, विद्याधर, महानसर्प, दानव, बड़े-बड़े दैत्य, राक्षस तथा गुह्ाक इत्यादि सब प्राप्त करना चाहे । तो ब्रह्माजी ने कहा-- हे वासुदेव ! इसे मैं आपको प्रदान करता हूँ आप ही इसे स्वीकार करे ॥६४-६५॥ मैंने देवताओं तथा दैत्यों को रोक दिया है । मैं आपके लालच रहित इस कर्म से प्रसन्न हूँ ॥६६॥ हे देवि ! तुम
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