Srishti Khanda Extracted Page 59
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-59
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुरण मन्थानं मंदरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्। ततो मथितुमारब्धा राजेंद्र तरसामृतम्॥३७॥ विबुधा सहिताः सर्वे यतःपुच्छं ततः स्थिताः। विष्णुनावासुकेदत्याः पूर्वकाये निवेशिताः ॥३८॥ ते तस्य प्राणवातेन वह्विना च हतत्त्विषः । निस्तेजसोऽ सुराः सर्वे बभूवुरमरद्युते ॥ ३ ९॥। तेनैव मुखनिःश्वासवायुनाथ बलाहकैः । पुच्छप्रदेशे वर्षद्धिस्तदा चाप्यायिताःसुराः ॥४०॥ क्षीरोदमध्ये भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मविदांवर । महादेवो महातेजा विष्णुपृष्ठनिवासिनौ ॥४१॥ बाहुभ्यां मंदरं गृह्य पद्मवत्स परंतपः । श्रृंखले च तदा कृत्वा गृहीत्वा मंदराचलम् ॥४२॥ देवानां दानवानां च बलमध्ये व्यवस्थितः । क्षीरोदमध्ये भगवान्कूर्मरूपी स्वयं हरिः ॥४३॥ अन्येन तेजसा देवानुपबरृहितवान्हरिः । मथ्यमाने ततस्तस्मिन् क्षीराब्धौ देवदानवैः ॥४४॥ हविर्धान्यभवत् पूर्वं सुरभिः सुरपूजिता । जग्मुर्मुदं तदा देवा दानवाश्च महामते ॥४५॥ व्याक्षिप्तचेतसःसर्वे बभूवुस्तिमितेक्षणाः । किमेतदिति सिद्धानां दिवि चिंतयतां तदा ॥४६॥ बभूव वारुणी देवी मदाधूपितलोचना । कृतावर्त्ता ततस्तस्मात्प्रस्खलंती पदे पदे ॥४७॥ एकवख्रा मुक्तकेशी रक्तांतस्तब्धलोचना । अहं बलप्रदा देवी मां वा गृहन्तु दानवाः ॥४८॥ अशुचिं वारुणीं मत्वा त्यक्तवंतस्तदा सुराः । जगृहुस्तां तदा दैत्या ग्रहणान्ते सुराभवत्॥४९॥ मंथेन पारिजातोभूद्देवश्रीनदनो द्रुमः । रूपौदार्य्यगुणोपेतास्ततश्चाप्सरसां गणाः ॥५०॥ षष्टिकोट्यस्तदाजातास्सामान्या देवदानवैः । सर्वास्ताः कृतपूर्वास्तु सामान्या: पुण्यकर्मणा ॥५१॥ शरत् कालीन मेघ के समान कान्ति वाले क्षीरसागर में डालकर ॥३६॥ मन्दराचल को मथानी तथा वासुकी को मेत्र बनाकर हे राजेन्द्र ! बलपूर्वक अमृत मन्थन का कार्य प्रारम्भ किए ॥३७॥ सभी देवता अमृत मन्थन का कार्य प्रारम्भ किए ॥३७॥ सभी देवता वासुकी के पूंछ की ओर लग गये तो भगवान् विष्णु ने दैत्यों को वासुकि के मुख की ओर लगा दिया ॥३८॥ हे देवताओं के समान कान्ति वाले भीष्मजी ! वासुकि के श्वास की वायु की अग्नि से सभी दैत्य निस्तेज हो गये, उनकी कान्ति क्षीण हो गयी ॥३९॥ उस मुख की वायु के द्वारा क्षिप्त वासुकि की पूंछ की ओर जाकर वर्षा करने वाले मेधों के कारण देवता पुष्ट हो गये ॥४०॥ क्षीरसागर के बीच में ब्रह्म ज्ञानियों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी तथा शङ्करजी कूर्म रूपधारी भगवान् विष्णु के पीठ पर खड़े होकर ॥४१॥ अपनी मुजाआं की श्रृंखला बनाकर कमल के समान मन्दराचल को पकड़े हुए थे ॥४२॥ क्षीरसागर के भीतर स्वयं भगवान् श्रीहरि कूर्म रूप से विराजमान थे और वे देवताओं और दैत्यों के बीच में भी एक रूप से विद्यमान थे ॥४३॥ अपने दूसरे तेज से श्रीहरि देवताओं को पुष्ट बना रहे थे । देवताओं तथा दैत्यं द्वारा क्षीरसागर के मथे जाते समय ॥४४॥ समुद्र से सर्वप्रथम देवताओं द्वारा पूजित सुरभि गौ (कामधेनु) प्रकट हुयी । जो हविष्य का उत्पत्ति स्थान मानी गयी है । हे महामत्ते ! उस समय देवता तथा दैत्य दोनों प्रसन्न हो गये ॥४५॥ सबके सब आश्चर्य-चकित थे, उनकी टकटकी बँध गयी । आकाश में सिद्धगण सोच रहे थे कि यह क्या है ?॥४६॥ उसी समय वारुणी देवी प्रकट हुयी । उसके मद भरे नेत्र धूर्णित हो रहे थे । वह पग-पग पर लड़खडाती चलती थी ॥४७॥ एक ही वस्र धारण की थी । उसके केश खुले हुए थे, उसके लाल- लाल नेत्र स्तब्ध थे । उसने दानवों से कहा-- मैं बलप्रदान करने वाली हूँ, दानवों ! आपलोग मुझे स्वीकार करें॥४८॥ वारुणी को अपवित्र मानकर देवताओं ने उसे त्याग दिया । उसको दैत्यों ने स्वीकार कर लिया और स्वीकार कर लेने पर वह सुरा (मदिरा) बन गयी । मंथन काल में पारिजात वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो देवताओं के नदंन वन का ऐश्वर्य वृक्ष बन गया । उसके बाद रूप तथा ऐश्वर्य से युक्त अप्सराओं का गण प्रकट हुआ ॥४९-५०॥ ऐसी
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know