Srishti Khanda Extracted Page 58
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-58
Sanskrit Original
आरूहौरावत॑ नागं प्रययावमरावतीम्। ततः प्रभृति निःश्रीकं सशक्रं भुवनत्रयम् ॥२२॥ न यज्ञाः संप्रवर्तन्ते न तपस्यंति तापसाः। न च दानानि दीयते नष्टप्रायमभूज्जगत्॥२३॥ एवमत्यंतनिःश्रीके त्रैलोक्ये सत्त्ववर्जिते । देवान्प्रतिबलोद्योगं चक्रु्दैतियदानवाः ॥२४॥ विजिताखिदशादैत्यैरिंद्राद्याः शरणं ययुः । पितामहं महाभागं हुताशनपुरोगमाः ॥२५॥ यथावत्कथिते देवैर्ब्रह्मा प्राह तथासुरान् । क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम सहितःसुरैः ॥२६॥ गत्वा जगाद भगवान् वासुदेवं पितामहः । उत्तिष्ठ विष्णो शीघ्रं त्वं देवतानां हितं कुरु ॥२७॥ त्वया विना दानवैस्तु जिताःसर्वे पुनः पुनः। इत्युक्तः पुंडरीकाक्ष: पुरुषः पुरुषोत्तमः ॥ २८॥ अपूर्वरूपसंस्थानान्दृष्ट्वा देवानुवाच ह । तेजसो भवतां देवाः करिष्याम्युपवृंहणम्॥२९॥ वदाम्यहं यत्क्रियतां भवद्भिस्तदिदं सुराः। आनीय सहिता दैत्यैः क्षीराब्धौ सकलौषधीः॥३०॥ मंथानं मंदरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्। मथ्यताममृतं देवा:सहाये मय्यवस्थिते ॥३ १॥ सामपूर्वं च दैतेयांस्तत्र सम्भाष्य कर्मणि । समानफलभोक्तारो यूंय चात्र भविष्यथ ॥३२॥ मथ्यमाने च तत्राब्धौ यत्समुत्पद्यतेऽ मृतम्। तत्पानाद्दलिनो यूयममराः संभविष्यथ ॥३३॥ तथैवाहं करिष्यामि यथा त्रिदशविद्विषः । नप्राप्स्यंत्यमृतं देवा:केवलं क्लेशभागिनः ॥३४॥ इत्युक्ता देवदेवेन सर्व एव ततःसुराः । संधानमसुरैः कृत्वा यत्मवंऽतोऽमृतेभवन् ॥३५॥ सर्वौषधी: समानीय देवदैतेयदानवा:। क्षिप्वा क्षीराब्धिपयसि शरदभ्रामलत्विषि ॥३६॥ महर्षि ने कहा ॥२०॥ इन्द्र ! बहुत कहने से कोई लाभ नहीं है, में क्षमा नहीं कर सकता हुँ । यह कहकर महर्षि दुर्वासा वहाँ से चले गये और इन्द्र भी ॥२१॥ उस ऐरावत हाथी पर चढकर अमरावती चले गये । उसी समय से इन्द्र के साथ त्रैलोक्य भी श्रीविहीन हो गया ॥२२॥ न तो कोई यज्ञ करता था और न तो कोई तपस्या करता था । कोई दान भी नहीं करता था । सारा संसार नष्टप्राय हो गया ॥२३॥ इसतरह से त्रैलोक्य के अत्यन्त श्रीविहीन तथा सत्त्वहीन हो जाने पर दैत्यों तथा दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया ॥२४॥ पराजित होकर इन्द्र इत्यादि देवता ब्रह्माजी की शरण में गये और अग्नि आदि देवताओं ने महाभाग ब्रह्माजी ।।२५॥ से सारी बातें बतलायी । ब्रह्माजी देवताओं को साथ लेकर क्षीरसागर के उत्तर तट पर गये ॥२६॥ वहाँ पर जाकर ब्रह्माजी ने भगवान् वासुदेव से कहा-- हे भगवन् विष्णो ! आप शीघ्र जागें और देवताओं का कल्याण करें ॥२७॥ आपके बिना सभी देवता दैत्याँ के द्वारा बार-बार पराजित कर दिये गये । इस तरह से कहे जाने पर पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) भगवान् पुरुषोत्तम ने ॥२८॥ देवताओं को अपूर्व रूप तथा अङ्गां वाला देखकर कहा-- देवताओं ! मैं तुमलोगों के तेज का संवर्द्धन करूँगा ॥२९॥ देवताओं ! मै जैसा कहता हूँ, वैसा आपलोग करें । आपलोग दैत्यों के साथ समस्त वनौषधियों को लाकर क्षीरसागर में डालें ॥३०॥ फिर मन्दणाचल को मथानी तथा वासुकी को उसका नेत्र (रस्सी) बनाकर मेरी सहायता से आपलोग अमृत का मन्थन करें ॥३१॥ आपलोग सामनीति को अपना कर दैत्यों को इस कार्य में समिलित करें, और उनसे कहें कि समुद्र से निकली वस्तुओं का फल आपलोग भी समान रूप से भोगेंगे॥ ३ २॥ देवताओं ! समुद्र का मन्थन करने से जो अमृत निकलेगा उसका पान करके आपलोग बलवान हो जायेंगे ॥३३॥ मैं ऐसा उपाय करूँगा कि देवताओं से द्वेष करने वाले असुरों को अमृत न मिले, उनके हिस्से में केवल परिश्रम करना ही मिलेगा ॥३४॥ श्रीमगवान् के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर देवताओं ने असुरों से सन्धि कर ली और अमृत प्राप्त करने के प्रयास में लग गये ॥३५॥ देवता, दैत्य तथा दानव सभी औषधियों को लाकर
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