Srishti Khanda Extracted Page 57

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-57

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Sanskrit Original

ददौ तस्मै मुदा युक्ता तां मालां स तदा नृप । गृहीत्वा सुचिरं कालं शिरोमालां बबंध ह ॥७॥ उन्मत्तप्रेतवद्विप्र शोभमानो व्रवीदिदम् । इयं विद्याधरी कन्या पीनोन्नतपयोधरा ॥८॥ शोभालंकारसौभाग्यै रक्ता दृष्टा ततो मनः । क्षोभमायाति मे चाद्य नाहं कामे विचक्षणः ॥९॥ ब्रजामि तावदन्यत्र सौभाग्यं स्वं प्रदर्शयन्। एवमुक्त्वा स॒ राजेंद्र परिबभ्राम मेदिनीम् ॥९०॥ ऐरावतं समारूढं राजानं त्रिदिवौकसाम् । त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं भ्राजमानं शचीपतिम् ॥९९॥ तामात्मशिरसो मालां भ्रमदुन्मत्तषट्पदाम् । आदायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः ॥ १ २॥ गृहीत्वा देवराजेन माला सा गजमूर्डनि। मुक्ता रराज सा माला कैलासे जाह्नवी यथा॥१३॥ मदांधकारिताक्षोसौ गंधाघ्राणेन वारणः । करेणादाय चिक्षेप तां मालां पृथिवीतले ॥९४॥ ततंश्षुक्रोध भगवान् दुर्वासा मुनिपुंगवः । राजेंद्र देवराजानं क्ुब््श्चेदमुवाच ह॥९५॥ ऐश्वर्यमददुष्टात्मन्नतिस्तब्धोसि वासव । श्रियो धाम स्रजं यस्मान्महत्तान्नभिनंदसि ॥१६॥ त्रैलोक्यश्रीरतोमूढ विनाशमुपयास्यति । मददत्ता भवता माला क्षिप्ता यस्मान्महीतले॥१७॥ तस्मात्प्रणष्टलक्ष्मीकं त्रैलोक्यं ते भविष्यति । यस्य संजातकोपस्य भयमेतिचराचरम् ॥१८॥ तं मां त्वमतिगर्वेण देवराजावमन्यसे । महेंद्रो वारणस्कंधादवतीर्य त्वरान्वितः ॥९९॥ प्रसादयामास मुर्नि दुर्वाससमकल्मषम् । प्रसाद्यमानः स तदा प्रणिपात पुरः सरम् ॥२०॥ नाहं क्षमिष्ये बहुना किमुक्तेन शतक्रतो। इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः॥२९॥ NR न नमन पनननन-+-न२ ० नन- को देखकर ॥५॥ कहा कि इसे तुम मुझे दे दो मैं इसे अपनी जटा में लगाऊँगा, इसतरह से ऋषि के द्वारा कहे जाने पर उस विद्याधारी ने ॥६॥ उस माला को प्रसन्नता पूर्वक उन्हें दे दिया । हे राजन् ! महर्षि दुर्वासा बहुत समय तक उस माला को अपने शिर में बाँधे रहे ॥७॥ उन्मत्त प्रेत के समान महर्षि दुर्वासा ने सुशोभित होते हुए कहा-- इस पुष्ट तथा उन्नत पयोधरों (स्तनों) वाली एवं शोभा तथा अलङ्कार से युक्त विद्याधरी कन्या को जब से मैंने देखा है, तब से मेरे मन में क्षोभ उत्पन्न होता हैं, किन्तु मैं कामकला में निपुण नहीं हूँ ॥८-९॥ इसलिए अपने सौभाग्य का प्रदर्शन करते हुए मैं अन्यत्र चला जाता हूँ । हे राजेन्द्र ! इस प्रकार से कहकर वे ऋषि पृथिवी पर भ्रमण करने लगे॥१०॥ ऐरावत नामक हाथी पर चढे हुए, देवताओं के राजा, सुशोभित होते हुए, शचीपति तथा त्रैलोक्य के स्वामी ॥११॥ इन्द्र को देखकर जिस पर मदमत्त भौरें मँडरा रहे थे उस अपने शिर की माला को हाथ में लेकर मुनि ने उन्मत्त के समान इन्द्र के ऊपर फेंका ॥१२॥ उस माला को लेकर इन्द्र ने गजराज ऐरावत के शिर पर लगा दिया। उससे वह हाथी उसी तरह से सुशोभित हुआ जिसतरह से कैलास पर्वत के ऊपर गङ्गा प्रवाहित हो रही हों १३॥ उस माला की सुगन्धि को प्राप्त करके वह हाथी मदमत्त हो गया । उसने अपनी सूंढ से उस माला को उठाकर पृथिवी पर फेंक दिया ॥१४॥ हे राजेन्द्र ! यह देखकर मुनियों में श्रेष्ठ महर्षि दुर्वासा क्रुद्ध हो गये और उन्होंने क्रुद्ध होकर इन्द्र से कहा ॥१५॥ ऐश्वर्य के मद से मत्त बने हुए दुष्ट इन्द्र ! तुम अत्यन्त स्तब्ध (ढीठ) हो गये हो, उसी के कारण तुमने लक्ष्मी के आश्रयभूत मेरी माला का समादर नहीं किया ॥१६॥ मूर्ख ! इसीके कारण त्रैलोक्य की लक्ष्मी का विनाश हो जायेगा, क्योंकि मेरे द्वारा दी गयी माला को तुमने पृथिवी पर फेंक दिया है॥१७॥ इसीलिए तुम्हारा त्रैलोक्य लक्ष्मी से हीन हो जायेगा । जिसके क्रुद्ध हो जाने पर चराचर जगत् भयभीत हो जाता है॥१८॥ देवराज ! इस प्रकार के मेरा तुमने अत्यन्त गर्वपूर्वक अपमान किया है । यह सुनकर इन्द्र शीघ्र ही हाथी पर से उत्तर कर ॥१९॥ मुनि दुर्वासा की प्रार्थना किये, इन्द्र के द्वारा साष्टाङ्ग प्रणाम पूर्वक प्रसन्न किए जाते हुए

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