Srishti Khanda Extracted Page 55
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-55
Sanskrit Original
व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत । सुखमृद्धिर्यशः कीर्तिरित्येते धर्मसूनवः ॥९९०॥ कामान्नंदी सुतं हर्ष धर्मपौत्रमसूयत। हिंसा भार्या त्वधर्मस्य तस्य जज्ञे तदानृतम॥१९१॥ कन्या चा निकृतिस्ताभ्यां भयं नरक एव च। माया च वेदना चैव मिथुनं द्वंद्रमेवच ॥१९२॥ तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् । वेदनायास्ततश्चापि दुःखं जज्ञेथ रौरवात् ॥१९३॥ ृ त्योर्व्याधिजराशोकतृष्णाक्रोधाश्च॒ जाज्ञिरे । दुःखोत्तराःस्मृता होते सर्वे चाधर्मलक्षणाः ॥१९४॥ नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा ते सर्वे ह्रध्वरेतसः । रौद्राण्येतानि रूपाणि ब्रह्मणो नृवरात्मज ॥१९५॥ नित्यं प्रलयहेतुत्वं जगतोस्य प्रयांति वै। रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि यथा ब्रह्मा चकार ह ॥१९६॥ कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतस्ततः । प्रादुरासीत््रभोरंके कुमारो नीललोहितः ॥१९७॥ रुदन् वै सुस्वरं सोऽथ द्रवंश्च उपसत्तम । कि रोदिषीति तं देवो रुदंतं प्रत्युवाच ह ॥१९८॥ नाम धेहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच प्रजापतिम् । रोदनाद्रुद्रनामासि मारोदी्धैर्यमावह ॥१९९॥ एवमुक्तः पुनस्सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद ह। ततोन्यानि ददौ तस्मै सप्तनामानि वै प्रभुः ॥२००॥ मूर्त्तीनां चैवमष्टानां स्थानान्यष्टौ चकार ह । भवं शर्वमथेशानं तथा पशुपतिं नृप ॥२०१॥ भीममुअ्ं महादेवमुवाच स पितामहः । सूयों जलं महीवह्िर्वायुराकाशमेवच ॥२०२॥ दीक्षितो ब्राह्मणः सोम इत्येते तनवः क्रमात् । एवंप्रकारो रुद्रोऽसौ सतीं भाार्यामविंदत॥२०३॥ दक्षकोपाच्च तत्याज सा सती स्वं कलेवरम् । हिमवदुहिता साभूऱ्मेनायां नृपसत्तम ॥२०४॥ तथा पुष्टि ने लोभ को अपने पुत्र रूप से उत्पन्न किया ।॥१८८॥ मेघा ने श्रुत को, क्रिया ने दण्ड, नय तथा विनय को उत्पन्न किया । बुद्धि ने बोध को, लज्जा ने विनय को तथा वपु ने व्यवसाय नामक पुत्र को उत्पन्न किया । शान्ति ने क्षेम को उत्पन्न किया सुख, समृद्धि, यश तथा कीत ये धर्म के पुत्र हैं ॥१८९-१९०॥ काम से उनकी पली नंदी ने हर्ष को उत्पन्न क्रिया यह धर्म का पौत्र था । हिंसा अधर्म की पत्नी हुयी और उसका पुत्र अनृत उत्पन्न हुआ॥१९१॥ उन दोनों ने निकृति नामक कन्या तथा भय एवं नरक नामक पुत्रों को उत्पन्न किया । उसके बाद उन दोनों ने माया तथा वेदना नामक कन्याओ को जन्म दिया ॥१९२॥ उन दोनो में से माया ने सभी भूतों को विनष्ट करने वाले मृत्यु को जन्म दिया । उसके बाद वेदना ने रौरव नामक पति से दुःख को उत्पन्न किया ॥१९३॥ मृत्यु के व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा तथा क्रोध नामक पुत्र उत्पन्न हुए । ये सभी दुःखोत्तर रूप से प्रख्यात हें तथा अधर्म स्वरूप हें ॥१९४॥ इन सबों की न तो कोई पत्नी है और न कोई पुत्र है । ये सभी ऊधध्वरेता ब्रह्मचारी हैं । हे राजकुमार ! ये सभी ब्रह्माजी के रौद्र रूप हैं ॥१९५॥ ये सभी संसार के नित्य प्रलय के कारण बनते हैं । अब मैं ब्रह्माजी के द्वारा किया गया रुद्र सर्ग का वर्णन करूँगा ॥१९६॥ कल्प के प्रारम्भ में जब ब्रह्माजी अपने ही समान पुत्र का ध्यान कर रहे थे उस समय उनकी गोद में नीललोहित कुमार का प्रादुर्भाव हुआ ॥१९७॥ हे नृपश्रेष्ठ ! उसको सुन्दर स्वर में रोते हुए देखकर ब्रह्माजी ने पूछा क्यों रोते हो ?॥१९८॥ उसने ब्रह्माजी से कहा-- आप मुझे नाम प्रदान करें । ब्रह्माजी ने कहा कि तुम रोए अतएव तुम्हारा नाम रुद्र है । रोओ मत धैर्य धारण करो ॥१९९॥ इसी प्रकार से वह कुमार सात बार रोया और उसके अनुसार ब्रह्माजी ने उसे अन्य नामों को प्रदान किया ॥२००॥ इसीतरह से उसकी आठ मूर्तियों (शरीरो) और स्थानों का उन्होंने निर्देश किया । वे नाम है, भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव इन नामों को ब्रह्माजी ने बतलाया । उनकी मूर्तियाँ (शरीर भी) क्रमश: सूर्य, जल, पृथिवी, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, ब्राह्मण तथा सोम हैं । इस प्रकार के रुद्र ने दक्ष की पुत्री सती को अपनी
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know