Srishti Khanda Extracted Page 54
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-54
Sanskrit Original
विभजात्मानामित्युक्तवा तं ब्रह्यांतर्दधे ततः । तथोक्तो5सौ. द्विधास्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाकरोत् ॥९७४॥ विभेदपुरुषत्वं च दशधा चैकधा च सः । सौम्यासौम्यैस्तथारूपैः शांतैः स्त्रीत्वं च स प्रभु ॥१७५॥ विभेद बहुधा चैव स्वरूपैरसितैः सितैः । ततो ब्रह्मा स्वयं भूतं पूर्व स्वायंभुवं प्रभुम् ॥१७६॥ आत्मानमेव कृतवान् प्राजापत्ये मनुं नृप । शतरूपां च तां नारीं तपोनिर्धतकल्मंषाम् ॥१७७॥ स्वायंभुवो मनुर्नाम पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः । तस्माच्च पुरुषाद्ेवीशतरूपा व्यजायत ॥१७८॥ प्रियव्रतोत्तानपादप्रसूत्याकूतिसंज्ञितम् । ददौ प्रसूतिं दक्षाय आकूतिं रुचये पुरा ॥१७९॥ प्रजापतिः स जग्राह तयोजज्ञें सदक्षिणः । पुत्रो यज्ञो महाभाग दंपत्योर्मिथुनें ततः ॥९८०॥ यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे । यामा इति समाख्याता देवाः स्वायंभुवे मनौ ॥९८१॥ प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिं तथा। ससर्ज कन्यास्तासां तु सम्यङ् नामानि मे शृणु ॥९८ २॥ श्रद्धा लक्ष्मी शतिः पुष्टिस्तुष्टिमेंधा क्रिया तथा । बुद्धिर्लज्जा वपुः शांतिऋद्ध: कीर्तिस्रयोदशी ॥१८३॥ पत्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मोदाक्षायिणीः प्रभु। ताभ्यः शिष्टा यवीयस्प एकादशसुलोचनाः ॥१८४॥ ख्यातिः सत्यथ संभूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा । सन्नतिश्चानसूया च ऊर्ज्जास्वाहा स्वधा तथा ॥१८५॥ भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवांगिरा मुनिः। अहं च पुलहश्चैव क्रतुर्मुनिवरस्तथा ॥१८६॥ अत्रिर्वसिष्ठो वह्नि पितरश्च यथाक्रमम् । ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो राजसत्तम॥९८७॥ श्रद्धा कामं बलं लक्ष्मीर्नियमं धृतिरात्मजम् । संतोषं च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरसूयत ॥१८८॥ मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमेवच । बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम् ॥१८९॥ के सूर्य के समान कान्ति वाले रुद्र की उत्पत्ति हुयी । उनका आधा शरीर नारी का तथा भयङ्कर था ॥१७२-१७३॥ उनको ब्रह्माजी ने कहा-- तुम अपने शरीर का विभाग करो, यह कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये । इस तरह से ब्रह्माजी के कहने पर रुद्र ने अपने शरीर का स्त्री तथा पुरुष के रूप में दो विभाग कर दिया । उसके बाद रुद्र ने अपने पुरुष शरीर को सौम्य तथा असौम्य दश रूपों में विभक्त करके ग्यारहवें स्वयं हो गये । इसीतरह से उन्होंने स्त्री शरीर का भी सौम्य तथा असौम्य विभाग किया ।॥१७४-१७५॥ उसके बाद ब्रह्माजी ने पहले ही स्वयं उत्पन्न स्वायम्भुव को मनु बना दिया और स्वयं प्रजापति बने रहे । हे राजन् ! उसके बाद स्वायम्भुव मनु ने तपस्या करने के कारण कल्मष रहित शतरूपा नामक नारी को ॥१७६-१७७॥ पत्नी रूप से स्वीकार किया । उस मनु के देवी शतरूपा के गर्भ से चार सन्तानें उत्पन्न हुयीं प्रियव्रत, उत्तानपाद, प्रसूति और आकृति । उन्होने प्रसूति का विवाह दक्ष से कर दिया और आकूति का रुचि महर्षि से कर दिया ॥१७८-१७९॥ वे प्रजापति उन दोनों से दक्षिणा के साथ यज्ञ नामक पुत्र को प्राप्त किये । हे महाभाग ! वे दोनों यज्ञ तथा दक्षिणा परस्पर में पति-पत्नी हो गये ॥१८०॥ यज्ञ के दक्षिणा के गर्भ से बारह पुत्र उत्पन्न हुए । वे स्वाग्यभुव मन्वन्तर में याम देवता के नाम से प्रख्यात हुए ॥१८१॥ दक्ष ने प्रसूति के गर्भ से चौबीस कन्याओं को उत्पन्न किया, उन सबों का तुम नाम सुनो ॥१८२॥ श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपुः, शान्ति, ऋद्धि और कीर्ति ॥१८३॥ दक्ष की इन तेरह पुत्रियों को धर्म ने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया । उन सबों से बची हुयी ग्यारह सुन्दरियाँ ये हें ॥१८४॥ ख्याति, सती, संभृति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा ॥१८५॥ भृगु, शङ्कर, मरीचि, अङ्गिरा मुनि, मैं (पुलस्त्य) पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि तथा पितृगणों ने हे राजवर्य ! उपर्युक्त ख्याति आदि दस कन्याओं को अपनी पत्नी बनाया ॥१८६-१८७।। श्रद्धा ने काम को, लक्ष्मी ने बल को, धृति ने नियम को, तुष्टि ने सन्तोष को
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