Srishti Khanda Extracted Page 53

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-53

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Sanskrit Original

योगिनाममृतं स्थानं ब्रह्मणःपरमं पदम्। एकांतिन:सदोद्युक्ता ध्यायिनो योगिनो हि ये ॥१५९॥ तेषां तत्परमं स्थानं यत्तत्पश्यंति सूरयः। गतागता निवर्तते चंद्रादित्यादयो ग्रहाः ॥१६०॥ अद्यापि न निवर्तते नारायणपरायणाः । तामिस्रमंधतामिस्रं महारौरवरौरवम् ॥९६ १॥ असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिमत् । विनिंदकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम् ॥१६२॥ स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये । ततोभिध्यायतस्तस्य जज्ञिरे मानसाःप्रजाः ॥१६३॥ तच्छरीरसमुत्पन्नैः कायस्थैः करणैः सह क्षेत्रज्ञाः समवर्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः ॥१६४॥ ते सर्वे समर्वर्तन्त ये मया प्रागुदाहृताः । देवाद्याःस्थावरांताश्च॒ त्रैगुण्यविषये स्थिताः ॥१६५॥ एवंभूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च। यदास्य ताःप्रजाः सर्वा न व्यवर्द्धत धीमतः ॥९६६॥ अथान्यान्मनसाम्युत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत् । भृगुं मां पुलहं चैव क्रतुमंगिरसं तथा ॥१६७॥ मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसान् । नवब्र्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥१६८॥ सनंदनादयो ये च पूर्व सृष्टास्तुवेधसा । न ते लोकेष्वसज्जंत निरपेक्षाः प्रजासु ते॥१६९॥ सर्वे ह्यागताविज्ञाना वीतरागा विमत्सराः। तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः ॥९७०॥ ब्रह्मणोभून्महान्क्रोधख्रैलोक्यदहनक्षमः । तस्य क्रोधात्समुद्धत ज्वालामालावदीपितम् ॥९७९॥ ब्रह्मणस्तु तदाज्योति्रेलोक्यमखिलं दहत्। भ्वुकुटीकुटिला तस्य ललाटात्क्रोधदीपितात् ॥९७२॥ समुत्पन्नस्तदारुद्रो मध्याह्वार्कसमप्रभः । अर्ब्दनारीनरवपुः प्रचण्डोतिशरीरवान् ॥९७३॥ हड s ल जट की प्राप्ति होती है, संन्यासियों को ब्राह्मलोक की प्राप्ति होती है ॥१५८॥ योगियों को परंब्रह्म के नित्य परं पद की प्राप्ति होती है । जो एकान्त में रहकर सदा वेदाध्ययन करते है, उन लोगों को परमात्मा के उसी स्थान की प्राप्ति होती है, जिसका सूरिजन निरन्तर साक्षात्कार करते रहते हैं । चन्द्रमा तथा आदित्य इत्यादि बार-बार पुन: अपने पद को प्राप्त करके पुन: इस संसार में आते रहते हैं ॥१५९-१६०॥ किन्तु जो भगवान् नारायण की उपासना करने वाले जीव हैं, वे कभी भी इस संसार में नहीं आते हैं । वेदों की निन्दा करने वाले तथा यज्ञों को विध्वंस करने वाले, लोगों को तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, गैरव, भयङ्कर असिपत्र वन, तरङ्ग रहित कालसूत्र ॥१६१-१६२॥ इन सभी नरकों की प्राप्ति होती है । अपने धर्म का परित्याग करने वालों के लिए भी ये ही स्थान बतलाये गये हैं । उसके बाद ब्रह्माजी जब सृष्टि का चिन्तन कर रहे थे, उस समय उनकी मानस सन्तानें उत्पन्न हुयीं ।।१६३॥ वे जीव ब्रह्माजी के शरीर से उत्पन्न तथा इन्द्रियों से युक्त थे, औरवे ब्रह्माजी के ही शरीर से युक्त थे ॥१६४॥। वे सब देवता से लेकर वृक्षपर्यन्त के ही जीव थे, जिनका वर्णन मैं पहले कर चुका हूँ । वे सब तीनों गुणों से युक्त थे ॥१६५॥ इस प्रकार से जिनकी ब्रह्माजी ने सृष्टि की थी, उन सृष्टियों की प्रजायें जब नहीं बढ सकी ॥१६६॥। उसके बाद ब्रह्माजी ने अपने दूसरे मानस पुत्रों की सृष्टि की । भृगु महर्षि, मेरी, (पुलस्त्य) पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा दक्ष ये नवों ब्राह्मण हुए यह पुराणों में बतलाया गया है ॥१६७-१६८॥ ब्रह्माजी ने सनन्दन आदि जिन अपने मानस पुत्रों की सृष्टि पहले की थी, वे लोक से संबद्ध नहीं हुए वे सन्तानों के विषय में निरपेक्ष थे ॥१६९॥वे सबके सब स्वाभाविक ज्ञान सम्पन्न, मत्सर रहित एवं संसार से उदासीन (वीतराग) थे । लोक की सृष्टि के विषय में उन सबों को इस प्रकार से निरपेक्ष देखकर, महात्मा, ब्रह्माजी को ॥१७०॥ त्रैलोक्य को भस्म कर देने में समर्थ क्रोध उत्पन्न हो गया । उनके उस क्रोध की ज्वाला समूह से प्रकाशित ॥१७१॥। ब्रह्म ज्योति उत्पन्न हुयी और उसने सम्पूर्ण त्रैलोक्य को जला दिया । टेढी भौहों से युक्त तथा क्रोध के कारण प्रकाशमान ब्रह्माजी के ललाट से, मध्याह

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