Srishti Khanda Extracted Page 52
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-52
Sanskrit Original
काव्यास भा सृष्टिखण्ड २७ प्रतिहारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजा: पुनः । वार्तोपायं ततश्रक्रुईस्तसिद्धि.. कर्मजाम् ॥१४४॥ व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमा अणवस्तिला: । प्रियंगुकोविदाराश्च कोरदूषाः सचीनकाः॥९४५॥ माषा मुद्रा मसूराश्च निष्पावाः सकुलुत्यकाः । अढकाश्चणकाञ्चैव शणस्सप्तदश स्मृताः॥१४६॥ इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो नृप । ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्या वन्याक्जतुर्दश ॥९४७॥ व्रीहयःसयवा माषा गोधूमा अणवस्तिला: । प्रियंगुसप्तमा होता अष्टमास्तु कुलुत्थकाः ॥१४८॥ शयामाकस्त्वथनीवारो वर्तुलस्सगवेघुकः । अथ वेणुयवाःप्रोक्तास्तदन्मर्कटका तृप ॥१४९॥ ग्राम्या वन्याः स्मृता होता ओषध्यश्च चतुर्दश । यज्ञनिष्पत्तये तद्वत्तथासां हेतुरुत्तमः ॥१५०॥ एताश्च सह यज्ञेन प्रजानां कारणं परम् । परापरविदः प्राज्ञस्ततो यज्ञान्वितन्वते ॥१५ १॥ अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां पार्थिवोत्तम । उपकारकरं पुंसां क्रियमाणं फलार्थिनाम् ॥१५२॥ येषां च कालसृष्टोऽसौ पपाबिदुर्महामते । मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम् ॥१५३॥ वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान् धर्मभृतांवर। लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥१५४॥ प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं तु पार्थिव। स्थानमैद्रं क्षत्रियाणां सङ्ग्मामेष्वनिवर्तिनाम् ॥१५५॥ वैश्यानाम्मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम् । गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यासु वर्तिनाम् ॥१५६॥ अष्टाशीतिसहस्राणां यतीनामूद््ध्वरेतसाम्। स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम्॥१५७॥ सप्तर्षीणां च यत्स्थानं स्मृतं तद्वैवनौकसाम् । प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्राह्मसंज्ञितम् ॥१५८॥ नगरों में उन सबों ने अपने अनुकूल गृहों को बनाया । हे महामत्ते ! प्रजाओ ने यह सब शीत तथा आतप (धूप) आदि की बाधाओं से बचने के लिए किया ॥१४३॥ शीत आदि से इस प्रकार से रक्षा के उपाय को करके उन प्रजाओं ने कृषि के उपायों को तथा कर्म जन्य हस्त शिल्प को किया ॥१४४॥ उससे उनलोगों ने सत्रह प्रकार के ग्राम्य अन्नों की जातियों को उत्पन्न किया । वे हैं धान, यव, अणु, तिल, प्रियंगु, कोविदार, कोरदृष (कोदव) चीन, उडद, मूंग, मसूर, निष्पावा, कुलथी, आढक, चना तथा शण ॥१४५-१४६॥ हे राजन् ! ये सभी ग्राम्य अन्नों की जातियाँ है ग्रामों तथा वनों में उत्पन्न होने वाले यज्ञोपयोगी अन्न चौदह प्रकार के हैं ॥१४७॥ धान, यव, उड़द, गेहूँ, अणु, तिल, प्रियङ्गु, कुलथी, सावाँ, नीवार, वर्तुल, गवेधुक, वेणु यव तथा मर्कटक ॥१४८-१४९॥ ये सभी चौदह औषधियाँ (अन्य) आम्य तथा वन्य हैं । ये सभी यज्ञ सम्पादन के साधन हैं, और यज्ञ इन सबों की उत्पत्ति का उत्तम साधन है ॥१५०॥ यज्ञ के साथ ये सभी अत्र प्रजाओं की उत्पत्ति के श्रेष्ठ साधन हैं । अतएव पर एवं अपर त्तो के ज्ञाता पुरुष यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं । हे राजन् श्रेष्ठ ! यज्ञों का प्रतिदिन किया जाने वाला अनुष्ठान किये जाने वाले कर्मो का फल चाहने वाले मनुष्यों के उपकारक हैं ॥१५२॥ हे महामत्ते ! काल ने लोगों के लिए प्राप्य विन्दु की मर्यादा की स्थापना स्थान और गुण के अनुसार की हैं ॥१५३॥ हे धर्म का पालन करने वालों में श्रेष्ठ ! वणो तथा आश्रमों के धर्मा तथा सभी वर्णो का पालन करने वालों को प्राप्त होने वाले लोकों को आप सुनें ॥१५४॥ हे राजन् !ब्राह्मणों को प्राप्त होने वाले लोक को प्राजापत्य लोक कहा गया है ।युद्ध में पीठ नहीं दिखाने वाले क्षतरियों का लोक इन्द्रलोक बतलाया गया है ॥१५५॥ अपने धर्म का पालन करने वाले वैश्यों का लोक वायुलोक बतलाया गया है। स्वेतर वों की सेवा करने वाले शुद्रों को गान्धर्व लोक की प्राप्ति होती है ॥१५६॥ अट्टासी हजार ऊध्वरिता महर्षियों का जो स्थान बतलाया गया है, वही स्थान गुरु की सेवा में लगे रहने वाले शिष्यों को प्राप्त होता है ॥१५७॥ वन में रहने वाले वानप्रस्थियों को भी वही स्थान प्राप्त होता है जो स्थान सप्तर्षियों का है । गृहस्थों को प्राजापत्य लोक
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