Srishti Khanda Extracted Page 51

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-51

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Sanskrit Original

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या:शुद्राश्ष॒ नृपसत्तम । पादोरुवक्षस्थलतो मुखतश्च समुद्गता: ॥९३०॥ यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद्ब्रह्मा चकार ह । चातुर्वर्ण्यं महाराज यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥१३१॥ यज्ञेन यायिता देवा वृष्ठ्युत्सर्गेण मानवा: । आप्यायन्ते धर्मयज्ञा यतःकल्याणहेतवः ॥१३२॥ निष्पद्यते नरैस्ते तु सुकर्मनिरतैःसदा । विरूद्धाचरणापेतैः सद्धिः सन्मार्गगामिभिः ॥१३३॥ स्वर्गापवर्गमानुष्यात्परप्रुवंति नरा नृप । यच्चाभिरुचितं स्थानं तद्यांति मनुजा विभो॥१३४॥ प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाश्लातुर्वर्ण्यव्यवस्थितौ। सम्यक् शुद्धाःसमाचारा चरणा नृपसत्तम ॥१३५॥ यथेच्छावासनिरताः सर्वबाधाविवर्जिताः । शुद्धांतःकरणाः शुद्धा धर्मानुष्ठाननिर्मलाः ॥१३६॥ शुद्धे च तासां मनसि शुद्धांतःसंस्थिते हरौ । शुद्धज्ञानं प्रपश्यति ब्रह्माख्यं येन तत्पदम् ॥१३७॥ ततःकालात्मको योऽसौ विरिंचावास उच्यते । संसारपातमत्यर्थ घोरमल्पाल्पसारवत्॥९३८॥ अधर्मबीजभूतं तत्तमोलोभसमुद्रतम्। प्रजासु तासु राजेंद्र रागादिकमसाधनम्॥१३९॥ ततःसा सहजा सिद्धिरेवां नातीव जायते । राजन्वश्यादयश्चान्याः सिद्धयोष्टौ भवंति याः ॥१४०॥ तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके । इंद्वाभिभवदुःखार्तास्ता भवंति -ततःप्रजाः ॥१४१॥ ततोदुर्गाणि ताश्चक्ुर्वार््षपार्वतमौदकम् । धान्बनं च तथा दुर्ग पुरंखार्वटकादि यत् ॥१४२॥ गृहाणि च यथान्यायं तेषु चकुः पुरादिषु। शीततापादिबाधानां प्रशमाय महामते ॥९४३॥ SS RRS i पक लिज कलीमर अलंकार सकल पक उसी से हुआ ॥१२९॥ हे नृपश्रेष्ठ ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र उनके पैर जह्घा, वक्षःस्थल तथा मुख से उत्पन्न हुए (अर्थात् ब्रह्माजी के मुख से ब्राह्मणो की, वक्षःस्थल से क्षत्रियों की, ऊरूभाग से वैश्यों की तथा पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति हुयी ।) ॥१३०॥ यह सब कुछ ब्रह्माजी ने यज्ञ के सम्पादन के लिए किया । हे महाराज ! चातुर्वर्ण्य यज्ञ का उत्तम साधन है ॥१३ १॥ चूकि धर्मयज्ञ कल्याण करने वाले होते हैं, इसीलिए यज्ञ के द्वारा देवताओ की पुष्टि होती है, (और यज्ञ से प्रसन्न देवताओ के द्वारा की जाने वाली) वृष्टि से मनुष्य पुष्ट होते हैं ॥१३२॥ सन्मार्गगामौ, शा्रनिषिद्ध कर्मो को नहीं करने वाले तथा सत्कर्म परायण मनुष्यों के द्वारा यज्ञ निष्पादित किए जाते हैं ॥१३३॥ हे राजन् ! यज्ञ के द्वारा मनुष्य स्वर्ग, मुक्ति तथा मनुष्यत्व को प्राप्त करते हैं हे राजन् !उन यज्ञकर्ताओं के लिए जो उचित स्थान होता है, उस स्थान कोवे प्राप्त कर लेते हैं ॥१३४। हे नृपसत्तम ! जिनकी सूष्टि ब्रह्माजी ने की है, वह प्रजा चातुर्वर्ण्य में व्यवस्थित रहकर, अच्छी तरह से शुद्ध और सदाचार पालन करने वाली होती है ॥१३५॥ वे अपनी इच्छा के अनुसार निवास करने वाली तथा सभी प्रकार की बाधाओं से रहित होती हैं । वे प्रजाएँ शुद्ध धर्म का अनुष्ठान करने वाली, शुद्ध तथा निर्मल हो जाती हैं ॥१३६॥ उन सबों के शुद्ध हो जाने पर उनके शुद्ध अन्तःकरण में श्रीहरि का निवास हो जाता है । उसके कारण वे शुद्ध ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करके मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं।१३७॥ सीमित समय तक रहने वाला जो ब्रह्माजी का लोक है, वह संसार में पतन के भय से युक्त होने के कारण उस मुक्ति की अपेक्षा अल्प महत्त्व का है ॥१३८॥ हे राजेन्द्र ! उन प्रजाओं में धर्म अधर्म का कारणभूत, तमोगुण तथा लोभ से उत्पन्न होने वाले राग आदि मुक्ति आदि मुक्ति के साधक नहीं हैं ॥१३९॥ उसके (रागादि के) कारण उन जीव में आठ प्रकार का वशयत्व तथा अन्य प्रकार की सिद्धियाँ नहीं हो पाती हैं । उन सभी सिद्धियो के पूर्ण रूप से क्षीण हो जाने और पापों के बढ जाने पर; वे प्रजाएँ इन्द्रो (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) से अभिभव जन्य दुःखों से अत्यन्त दुःखी हो जाती हैं ॥१४०-१४१॥ उसके बाद प्रजाओं ने वृक्षों, पर्वतो, जलों अथवा मरुभूमियों में अपना दुर्ग बनाया । उसके पश्चात् उन सबों ने दुर्ग, खर्वट तथा नगर आदि को बनाया ॥१४२॥ उन

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