Srishti Khanda Extracted Page 50

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-50

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Sanskrit Original

अव्ययं चव्ययंचैव यदिदं स्थाणुजंगमम् । तत्ससर्ज तदा ब्रह्मा भगवानादिकृद्विभुः ॥९१७॥ तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे। तान्येव प्रतिपद्यंते सृज्यमानाः पुनः पुनः॥१९८॥ हिंस्राहिंस्रे मृदृक्ूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यंते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥१९९॥ इद्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः। नानात्वं विनियोगं च धातैवं व्यसृजत्स्वयम्॥९२०॥ नानारूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपंचनम् । वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार स: ॥१२९॥ ऋषीणां नामधेयानि यथावेदे श्रुतानि वै । यथानियोगं योग्यानि अन्येषामपि सोकरोत् ॥१२२॥ यथर्तावृतुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु॥९२३॥ करोत्येवं विध्यां सृष्टिं कल्पादौ स पुनः पुनः । सिसृक्षुश्इक्तियुक्तोसौ सृज्यशक्तिप्रचोदितः ॥ १ २४॥ भीष्प उवाच अर्वाक्स्रोतास्तुकथितो भवता यस्तु मानुष: । ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि ब्रह्मा तमसृजद्यथा ॥१२५॥ यथा सवर्णानसृजह॒णांश्ष स महामुने । यच्च तेषां स्मृतं कर्म विप्रादीनां तदुच्यताम् ॥९२६॥ पुलस्त्य उवाच सत्वाभिध्यायिनः पूर्वसिसृक्षोर्ब्रह्मण: प्रजाः । अजायंत कुरुश्रेष्ठ सत्वोद्विक्ता मुखात्मजाः ॥१२७॥ वक्षसो रजसोद्विक्तास्तथान्या ब्रह्मणोऽ भवन् । रजसस्तमसश्चैव समुद्रिक्तास्थोरुतः ॥१२८॥ पद्भ्यामन्याःप्रजा ब्रह्मा ससर्ज कुरुसत्तम । तमः प्रथानास्ता: सर्वाश्चातुर्वण्यमिदं तत: ॥९२९॥ ाक्षसों, सिंहों, पक्षियों, सर्पो तथा मृगों की सृष्टि किए ॥११५-११६॥ उस समय, विकृत तथा अविकृत होने वाले समस्त स्थावर एवं जङ्गमों की सृष्टि ब्रह्माजी किए ॥११७॥ उन सबों में जिन जीवों द्वारा पूर्व जन्म में जो कर्म किए गये थे, वे सभी कर्म उन जीवों को प्राप्त हो गये । बार-बार सृजित किए जाने वाले वे जीव उन्हीं कर्मो को प्राप्त करते हैं ॥११८॥ हिंसक, अहिंसक, मृदु तथा क्रूर, धर्म-अधर्म, सत्य एवं मिथ्या इत्यादि जिस प्रकार के संस्कार से वे युक्त होते हैं, उन्हीं कर्मो में उन जीवों की रुचि होती है ॥११९॥ इन्द्रियों के रूप रसादि विषयों में; भूतों में तथा शरीर में जगत् के स्वामी ब्रह्माजी ने स्वयं नानात्व तथा विनियोग की सृष्टि की ॥१२०॥ कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्माजी ने जीवों के नाम, रूप तथा कृत्यों का विस्तार वैदिक वाक्यों के ही अनुसार किया ॥१२१॥ वेदों में ऋषियों के भी जैसे नाम सुने गये हैं, उनके तथा अन्य जीवों के भी नाम नियोग (विधि वाक्यों) के अनुसार उन्होंने किया ॥१२२॥ जिस तरह से ऋतुओं के प्राप्त होने पर उनके विविध प्रकार के चिह्न आविर्भूत हो जाते हैं । उसी प्रकार युगों के प्रारम्भ में अनेक प्रकार के भाव उत्पन्न हो जाते हैं ॥१२३॥ सृष्टि करने की इच्छानुसार तथा सृष्टि की शक्ति से सम्पन्न ब्रह्माजी कल्प के प्रारम्भ में सृज्य पदार्थों की शक्ति से प्रेरित होकर उसी प्रकार से सृष्टि करते हें ॥१२४॥ भीष्मजी ने कहा-- आपने अर्वाक स्रोत सर्ग के नाम से मनुष्यां को कहा है । हे ब्रह्मन् ! इस अर्वाक् स्रोत की सृष्टि जिस प्रकार से ब्रह्माजी ने की उसे आप विस्तार से बतलाइये ॥१२५॥ उन्होंने जिस प्रकार से सवर्णो की सृष्टि को, उन सबों के गुणों को तथा ब्राह्मणों आदि के जो कर्म हैं, उन सबां को आप बतलाएँ ॥१२६॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे कुरुश्रेष्ठ ! सत्त्वगुण का ध्यान करने वाले, सृष्टि करने के इच्छुक ब्रह्माजी की सर्व प्रथम उनके मुख से जिनका सत्त्वगुण उद्रिक्त था, ऐसी प्रजाएँ उत्पन्न हुयीं ॥१२७॥ ब्रह्माजी के वक्षःस्थल से रजोगुण प्रधान दूसरी प्रजाएँ उत्पन्न हुयीं । उनके ऊरूभाग (जह्ठो) से ऐसी प्रजाएँ हुयीं जिनका रजोगुण तथा तमोगुण उद्रिक्त था ॥१२८॥ हे कुरुश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने अपने दोनों पैरों से दूसरी प्रजाओं की सृष्टि की जो तमोगुण प्रधान थी । यह चतुर्वर्ण्य भी

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