Srishti Khanda Extracted Page 49

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-49

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Sanskrit Original

ततःक्कुद्धेन वै स्रष्टा कोधात्मानो विनिर्मिताः। वर्णेन कपिशेनोग्रा भूतास्ते पिशिताशिनः॥९०२॥ धयतो गां समुद्धूता गंधर्वास्तस्य तत्क्षणात्। पिबंतो जज्ञिरेवाचं गंधर्वास्तेन तेऽभवन्॥९०३॥ एतानिसृष्ट्वा भगवान्ब्रह्मा तच्छक्तिचोदितः । ततः स्वच्छंदतोऽन्यानि वयांसि वयसोऽसृजत् ॥१०४॥ अवयो वक्षसश्षक्रे मुखतोजांश्च सृष्टवान्। सृष्टवानुदराद्ना्च महिषांश्च प्रजापतिः ॥१०५॥ पद्धयां चाश्वान्स मातंगान् रासभान् गवयान्मृगान् ।उष्ट्रानश्चतरांश्चैव न्यंकूनन्याश्चजातयः॥१ ० ६॥ ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे। त्रेतायुगमुखे ब्रह्मा कल्पस्यादौ नृपोत्तम॥९०७॥ सृष्ट्वा पश्चोषधीस्सम्यक् युयोज स तदाध्वरे । गामजं महिषमेषमश्चाश्चतरगर्दभान् ॥१०८॥ एतान् ् राम्यपशूनाहुरारण्यांश्च निबोध मे। श्वापदो द्विखुरो हस्ती वानरः पञ्चमः खगः ॥१०९॥ उष्टका: पशवष्यष्ठास्सप्तमाहुस्सरीसृपाः । गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम् ॥११०॥ अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्। यजुंषि त्रैष्टुभं छन्दःस्तोमं पञ्चदशं तथा ॥९१९९॥ ब्रहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात् । सामानि जगतीच्छन्दः स्तोमं सप्तदशं तथा ॥९ ९ २॥ वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात् । एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च ॥१९३॥ आनुष्टुभं स वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् । उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे॥१९४॥ सुरासुरपितृन् सृष्ट्वा मनुष्यांश्च प्रजापतिः । ततःपुनःससर्जासौ स कल्पादौ पितामहः ॥११५॥ यक्षान्पिशाचान्गंधर्वास्तथैवाप्सरसां गणान् । सिब्डकिन्नररक्षांसि हिस्रान्पक्षिमृगोरगान्॥ १ १६॥ अत्यन्त भयभीत ब्रह्माजी के शिर के बाल गिर गये ॥१००॥ शिर से गिरे हुए वे पुन: शिर पर जम (चढ) गये । उन सबों में जो चढ गये वे तो सर्प कहलाये तथा जो गिरे ही रह गये वे अहि कहलाये ॥१०१॥ उसके बाद क्रुद्ध ब्रह्माजी ने क्रोध प्रधान मांसभक्षी पिशाचों की सृष्टि की, वे कपिश वर्ण के तथा उग्र स्वभाव के थे ॥१०२॥ ब्रह्माजी द्वार गौ (वाणी) का पान करते समय ही गन्धर्वो की उत्पत्ति हुयी । इसीलिए वाणी का पान करने वाले वे गन्धर्व कहलाये ॥१०३॥ इन सबों की सृष्टि करके ब्रह्माजी ने श्रीभगवान् की शक्ति से प्रेरित होकर अपनी इच्छानुसार अपने वयस (आयु) से वायसों (पक्षियों) की सृष्टि की ॥१०४॥ उन्होंने अपने वक्षःस्थल से भेड़ों की, मुख से बकरियों की सृष्टि की । प्रजापति ने अपने पेट से गायों और भैसों की सृष्टि की ॥१०५॥ उन्होंने अपने दोनों पैरों से घोड़े, हाथी, गधे, नीलगाय, मृग, ऊट, खच्चर, न्यंकू तथा दूसरे जाति के पशुओं की सृष्टि की ॥१०६॥ उनके रोओं से फल एवं मूल प्रधान ओषधियों की उत्पत्ति हुयी । हे राजन् ! ब्रह्माजी ने त्रेतायुग के प्रारम्भ तथा कल्प के प्रारम्भ में पशुओं तथा ओषधियों (अन्नों) की सृष्टि करके उन सबों का यज्ञ में अच्छी तरह से उपयोग किया । गौ, बकरी, महिष (भैंस) मेष (भेंड) घोड़ा, खच्चर, गधे ॥१०८॥ इन सबों को ग्राम्य पशु कहा गया है, अब तुम अरण्य (वनों में रहने वाले) पशुओं को मुझसे सुनो, दो खुरों वाले पशु, हाथी, वानर, चिडिया ॥१०९॥ ऊंट ये छह प्रकार के पशु तथा सर्प वन्य जीव हैं । ब्रह्माजी ने अपने पूर्वमुख से गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्सोम, रथन्तरसाम ।¦११०॥ तथा अग्निष्टोम नामक यज्ञ की सृष्टि की । उन्होंने अपने दक्षिण मुख से, यजुषां, त्रिष्टुप् छन्द, पञ्चदश स्तोमों की।१११॥ नृहत्साम तथा उक्थ की सृष्टि की । साम, जगती छन्द, सप्तदश स्तोम ॥११२॥ वैरूप था अतिरात्र याग की सृष्टि ब्रह्माजी ने अपने पश्चिम मुख से की । इक्कीस प्रकार से अथर्व, आप्तोर्याम, वैराज तथा अनुष्टुप् छन्द की सृष्टि की! इसके अतिरिक्त उनके अङ्गों से उच्चावच (छोटे बड़े जीवों की सृष्टि हुयी) ॥११३-११४॥ देवता, असुर, पितृगणों तथा मनुष्यों की सृष्टि करके ब्रह्माजी कल्प के प्रारम्भ में पुन: यक्षो, पिशाचों, गन्धर्वो तथा अप्सराओं, सिद्धो, किन्नरों,

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