Srishti Khanda Extracted Page 48
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-48
Sanskrit Original
सिसृक्षोर्जघनात्पूव॑ जज्ञिरे त्वसुरास्ततः । तत्याज तां ततो दुष्टान्तमोमात्रात्मिकां तनुम् ॥८८॥ सा तु त्यक्ता तनुस्तेन राजेंद्राभूद्ठिभावरी । सिसृक्षुरन्यदेहस्थःप्रीतिमापुस्ततः सुराः ॥८९॥ सत्वोद्रिक्ताः समुद्धता मुखतो ब्रह्मणो नृष। त्यक्ता सापि तनुस्तेन सत्वप्रायमभूदिनम् ॥९०॥ ततो हि बलिनो रात्रावसुरा देवता दिवा। सत्वमात्रात्मिकां चैव ततोन्यां जमृहे तनुम् ॥९९॥ पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे । उत्सर्ज पितृन्कृत्वा ततस्तामापि स प्रभुः ॥९२॥ सा चोत्सृष्टा भवत्संध्या दिननक्तांतरास्थितिः । रजोमात्रात्मिकामन्यां जगृहे स तनु ततः ॥९३॥ रजोमात्रोत्कटा जाता मनुष्याःकुरुसत्तम। तामप्याशु स तत्याज तनुमाद्यां प्रजापतिः ॥९४॥ ज्योत्स्ना समभवाच्चापि प्राक्संध्या याभिधीयते। ज्योत्स्नागमे तु वलिनो मनुष्याःपितरस्तथा ॥९५॥ राजेंद्र संध्यासमये तस्मात्ते प्रभवंति वै। ज्योत्स्नारात्र्यहनीसन्ध्या चत्वार्येतानि वै विभोः ॥९६॥ ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपाश्रयाणि च । रजोमात्रात्मिकामेव ततोन्यां जगृहे तनुम् ॥९७॥ ततः ् षुद्ृह्मणो जाता जज्ञे कोपस्तया कृतः । क्षुत््षामो हांधकारे तु सोसृजद्धगवांस्ततः ॥९८॥ विरूपा अत्तुकामस्ते समधावंत तं प्रभुम् । रक्षतामेष यै रुक्तं राक्षसास्ते ततोऽभवन् ॥९९॥ ऊचुःखादाम इत्यन्ये ये ते यक्षास्तु ते भवन् । अतिभीतस्य तानुदृष्ट्वा केशाःशिर्यन्ति विधसः ॥९० ०॥ हीनाश्च शिरसो भूयःसमारोहंति ते शिरः। सर्पणात्तेऽ भवन्सर्पा हीनत्वादहयः स्मृताः ॥९०९॥ बाद ब्रह्माजी ने देवता, आसुर, पितृगण तथा मनुष्य इन चारों की सृष्टि की ॥८६॥ सृष्टि करने की इच्छा वाले ब्रह्माजी ने इन सभी (चारो प्रकार की) तथा जल की सृष्टि में आपने शरीर का उपयोग किया । मुक्तात्मा ब्रह्माजी की जङ्घाओं से दुरात्मा असुरों की उत्पत्ति हुयी । उसके बाद ब्रह्माजी ने अपने तम; प्रधान शरीर का परित्याग कर दिया॥८७-८८॥ हे राजेन्द्र ! ब्रह्माजी के द्वारा परित्यक्त शरीर रात्रि के रूप में परिणत हो गया । सृष्टि करने की इच्छा से ब्रह्माजी ने दूसरा शरीर धारण किया, उससे देवताओं की उत्पत्ति हुयी ॥८९॥ हे राजन् ! देवताओं में सत्त्व गुण उद्रिक्त था वे देवता ब्रह्माजी के मुख से पैदा हुए । उसके बाद ब्रह्माजी ने उस शरीर का भी परित्याग कर दिया और वही सत्त्व प्रधान दिन बन गया ॥९०॥ इसीलिए रात्रि में असुर बलवान होते हैं और दिन में देवता । उसके बाद ब्रह्माजी ने सत्त्वगुण प्रधान दूसरे शरीर को धारण किया उससे पिता के तरह मानने वाले ब्रह्माजी के उस शरीर से पितरों की उत्पत्ति हुयी । पितरों की सृष्टि करके ब्रह्माजी ने उस शरीर का भी परित्याग कर दिया ॥९२॥ ब्रह्माजी के द्वारा परित्यक्त वह शरीर ही दिन तथा रात्रि के बीच में रहने वाली सन्ध्या बन गयी । उसके बाद उन्होंने केवल रजोगुण से युक्त दूसरे शरीर को धारण किया ॥९३॥ हे कौरवश्रेष्ठ । उस शरीर से रजोगुण की अधिकता वाले मनुष्यों की सृष्टि हुयी प्रजापति ने उस प्रथम शरीर को भी शीघ्र ही त्याग दिया ॥९४॥ वह शरीर ज्योत्स्ना (प्रकाश) हो गया । उसे ही पूर्व सन्ध्या भी कहते हैं । इसीलिए पूर्व संध्या की बेला में मनुष्य तथा सायंकाल में पितृगण बलवान् होते हैं ॥९५॥ हे राजेन्द्र इसीलिए वे संध्या के समय ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन तथा सन्ध्या ये चारो ही होते है ॥९६॥ ब्रह्माजी के ये शरीर त्रिगुण (सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण) को अपना आश्रय बनाते हैं । उसके बाद ब्रह्माजी ने रजोगुण प्रधान दूसरे शरीर को धारण किया ॥९७॥ उसके बाद ब्रह्माजी को भूख लगी और ये उसके कारण क्रोध किए । भूखे ब्रह्माजी ने अन्धकार में ही सृष्टि की, उसके कारण ॥९८॥ जो सृष्टि हुयी उस सृष्टि फे जीव कुरुप तथा खाने की इच्छा वाले हुए और वे ब्रह्माजी को ही खाने के लिए दौड़े । उन सबों में से जिन सबों ने इसकी रक्षा करो कहा वे राक्षस हुए ॥९९॥ और जिन सबों ने कहा हम इसे खा रहे हैं; कहा ये यक्ष हो गये । उन सबों को देखकर
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know