Srishti Khanda Extracted Page 47

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-47

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Sanskrit Original

ते परिग्राहिणःसर्वे सविभागतरास्तु ते। चोदना जाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकास्तु ते ॥७५॥ इत्येते कथिताः सर्गाः षडत्रनृपसत्तम । प्रथमोमहतस्सर्गो द्वितीयो ब्रह्मणस्तु यः ॥७६॥ तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गो हि स स्मृतः। वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्गश्चैद्रियकः स्मृतः ॥७७॥ इत्येषः प्राकृतःसर्गःसंभूतो बुद्धिपूर्वकः। मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्यवैस्थावराः स्मृताः ॥७८॥ तिर्यकस्त्रोतश्चयः प्रोक्तस्तिर्यग्योन्यस्स उच्यते । ततोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥७९॥ ततोर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः। अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्विकस्ताममस्तु सः ॥८०॥ पंचैते वैकृताःसर्गाःप्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः । प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥८ १॥ एते तव समाख्याता नवसर्गाःप्रजापतेः । प्रकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः ॥८२॥ सृजतो जगदीशस्य किमन्यच्छोतुमर्हसि । भीष्म उवाच संक्षेपातकूथितासर्गा देवादीनां गुरो त्वया ॥८ ३॥ विस्तराच्छोतुमिच्छामि त्वत्तो मुनिवरोत्तम । पुलस्त्य उवाच कर्मभिर्भाविता:सर्वे कुशलाकुशलैस्तु ते ॥८ ४॥ ख्यात्या तया हानिर्मुक्ता: संहारेह्युपसंहता: । स्थावरान्तास्सुराद्यास्तु प्रजाराजंश्वतुर्विधा: ॥८ ५॥ ब्रह्मणःकुर्वतःसृष्टिं जज्ञिरे मानसाःस्मृताः । ततो देवासुरपितृन्मानुषांस्तु चतुष्टयम् ॥८६॥ सिसृक्षुरंभांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत् । मुक्तात्मनस्ततो जातादुरात्मानः प्रजापतेः ॥८७॥ वस्तु को और वर्तमान को जानते है । भूत आदि जीवों की सृष्टि छठा सर्ग कहलाता है ॥७४॥ वे सबके सब परिग्रही और अत्यधिक विभाग से युक्त हैं । उन भूतादि को प्रेरणा युक्त तथा जाप्यशील समझना चाहिए ॥७५॥ हे राजन् इस तरह से इन छह सर्गों को बतलाया गया । ब्रह्माजी का पहला सर्ग महत् तत्त्व का सर्ग है ॥७६॥ दूसरा तन्मात्राओं का सर्ग है, उसी को भूत सर्ग कहा गया है । इन्द्रियों के सर्ग को वैकारिक सर्ग (सात्त्विक सर्ग) कहते हैं ॥७७॥ इसतरह से तीन बुद्धि रहित सर्ग प्राकृत सर्ग कहलाते हैं । चौथा सर्ग मुख्य सर्ग है । पर्वत वृक्ष आदि स्थावरों को मुख्य कहते हैं ॥७८॥ तिर्यग्योनि के जीवों की सृष्टि को तिर्यक् स्रोत कहा गया है । उसके बाद छठा ऊर्ध्व स्रोतों का सर्ग है । उसी को देवसर्ग कहते हैं ॥७९॥ उसके बाद सातवाँ सर्ग अर्वाक ख्रोतों का है । वही मनुष्य सम्बन्धी सृष्टि है । आठवाँ सर्ग अनुग्रह सर्ग है । वह सत्त्व प्रधान तथा तमः प्रधान है ॥८०॥ ये पाँच सर्ग वैकृत सर्ग हैं । इनसे पहले के तीन सर्ग प्राकृत सर्ग हैं । इन सबों से भिन्न नवाँ सर्ग कौमार सर्ग है, यह प्राकृत एवं वैकृत दोनों प्रकार का है ॥८ १॥ इसतरह से मैंने प्रजापति (ब्रह्माजी) के नव सर्गो को बतलाया । इसमें प्राकृत एवं वैकृत ये दोनों प्रकार के सर्ग जगत् के मूल कारण हैं ॥८२॥ इसतरह से सृष्टि करने वाले जगदीश्वर की सृष्टियों को तुम्हें मैने बतलाया, अब दूसरा क्या सुनना चाहते हो ? भीष्मजी ने कहा-- हे गुरुदेव ! आपने संक्षेप में सृष्टियों का वर्णन किया है ॥८३॥ हे मुनिश्वरों में श्रेष्ठ मैं उसको विस्तार पूर्वक सुनना चाहता हुँ । पुलस्त्य महर्षि नेकहा-- सभी जीव कुशल (पुण्य) तथा अकुशल (पाप) रूपी कर्मो के संस्कार से युक्त है ॥८४॥ हे राजन् ! जिनका संहार काल में संहार हो जाता है, जिनकी मुक्ति नहीं हुयी है, ऐसे ख्याति रूप से स्थावरों से लेकर देवताओं पर्यन्त चार प्रकार की सृष्टियाँ होती हैं॥८५॥ सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी के मानसिक सङ्कल्प से उत्पन्न होने के कारण यह मानसिक प्रजा कहलायी । उसके

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