Srishti Khanda Extracted Page 46

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-46

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Sanskrit Original

तमो मोहो महामोहस्तामिस्रोहान्थसंज्ञ़क: । पंचधावस्थितःसर्गो ध्यायतस्तु महात्मनः ॥६१॥ बहिरंतश्चाप्रकाशः संवृतात्मा नगात्मकः । मुख्या नगा यतश्चोक्ता मुख्यसर्गस्ततस्त्वयम्॥६ २॥ तं दृष्ट्वाऽसाधकं सर्गममन्यदपरं प्रभुः । तस्याभिध्यायतस्सर्गस्तिर्यक्स्रोतोभ्यवर्तत ॥६३॥ यस्मात्तिर्यकग्रवृत्तिः स्वात्तिर्यक््रोतस्ततः स्मृतः । पश्वादयस्ते विख्यातास्तमः प्राया ह्यावेदिनः ॥६४॥ उत्पथय्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः । अहंकृतास्त्वहंमाना अष्टाविंशद्वधात्मकाः ॥६५॥ तमप्यसाधकं मत्वा ध्यायतोन्यस्ततोऽ भवत् । ऊर्धध्वस्रोतस्तृतीयस्तु सात्विकोर्ध्वमवर्तत ॥६६॥ ते सुखप्रीतिबहुला बहिरंतरनावृताः । प्रकाशा वहिरंतश्च॒ उअर्ध्वसतरोतास्ततः स्मृताः ॥६७॥ तु्टात्मनस्तृतीयस्तु देवसर्गस्तु संस्मृतः । तस्मिन्सर्गे भवत्त्रीतिर्निष्पन्ने ब्रह्मणस्तदा ॥६८॥ ततोन्यं स तदादध्यौ साधकं सर्गमुत्तमम् । असाधकांस्तु तान् ज्ञात्वा मुख्यसर्गादिसंभवान् ॥६९॥ तथाभिध्यायतस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्ततः । प्रादुर्भूतस्दाव्यक्तादर्वाक्रोतस्तु साधकः ॥७०॥ यस्मादर्वाकप्रवर्तते ततोऽर्वाक््रोतसस्तु ते। ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोधिकाः ॥७१॥ तस्मात्ते दुःखबहुला भूयो भूयश्च कारिणः । प्रकाशा बहिरंतश्च मनुष्याः साधकाश्चते ॥७२॥ पंचमोऽजुग्रहः सर्गःस चतुर्द्धा व्यवस्थितः । विपर्ययेण सिळ्या च शक्तचा तुष्टया तथैव च ॥७३॥ विवृत्तं वर्त्तमानं च तेन जानंति वै पुनः । भूतादिकानां भूतानां षष्ठःसर्गः स॒ उच्यते ॥७४॥ को नहीं करने के कारण वह सृष्टि त्तमोगुणमयी हुयी ॥६०॥ जिस समय ब्रह्म सृष्टि को करने के लिए चिन्तन करते थे उस समय वह सर्ग पाञ्च रूप में स्थित हो-गया तम, मोह, महामोह तामिस्र तथा अन्धतामिस्र ॥६१॥ उसमें भीतर बाहर कहीं भी प्रकाश नहीं था और वह पर्वतात्मक सृष्टि हुयी । चूकि पर्वतों को मुख्य कहा गया है, अतएव यह मुख्य सर्ग कहलाता है ॥६२॥ उस सर्ग को साधक नहीं देखकर ब्रह्माजी दूसरा सर्ग करना चाहे । उस समय जब वे ध्यान कर रहे थे तो उससे तिर्यक स्रोतों (पशुओं तथा पक्षियों) की उत्पत्ति हुयी ॥६३॥। चूकि उनकी तिर्यक प्रवृत्ति होती है, इसीलिए उन्हें तिर्यक स्रोत कहते हैं । पशु आदि तमः प्रधान तथा अज्ञानी रूप से विख्यात हैं ॥६४। वे उन्मार्गगामी, अज्ञान में ही ज्ञान की बुद्धि करने वाले, अहङ्कार से जन्य अभिमान युक्त होते हैं । ये अठाइस प्रकार के हैं । वे सबके सब भीतरी ज्ञान वाले तथा परस्पर में एक दूसरे से आच्छन्न हैं ॥६५॥ ब्रह्माजी ने उस सृष्टि को भी साधक नहीं माना और उससे भिन्न प्रकार की सृष्टि का चिन्तन करने लगे; उससे ऊर्ध्वस्नोत नामक तीसरे प्रकार की सृष्टि हुयी । वह सृष्टि सात्त्विक तथा ऊर्ध्व प्रवृति वाली हुयी ॥६६॥ उस सृष्टि के जीव सुख एवं आनन्द प्रधान थे। वे भीतर बाहर कहीं भी अज्ञान से आच्छादित नहीं थे । उनके भीतर एवं बाहर ज्ञान का प्रकाश था । इसीलिए वे ऊर्ध्वस्रोत कहलाये ॥६७॥ उस सृष्टि से ब्रह्माजी को सन्तोष हुआ इसलिए यह तीसरा देवसर्ग हुआ । उस सर्ग के पूर्ण हो जाने पर ब्रह्माजी को सुखानुभूति हुयी ॥६८॥ उन तीनों प्रकार के मुख्य सर्गो को साधक नहीं मानकर ब्रह्माजी ने उसमे मित्र उत्तम साधक सर्ग करने की इच्छा से ध्यान किया ॥६९॥ उसके बाद सत्य-सङ्कल्प करने वाले ब्रह्माजी के ध्यान करने से साधक अर्वाक स्रोतों की अव्यक्त से सृष्टि हुयी ॥७०॥ चूकि उस सर्ग के जीव नीचे की ओर प्रवृत्ति वाले होते हैं अतएव वे अर्वाक स्रोत हुए । उनमें ज्ञान का प्रकाश अधिक होता है, वे उद्रिक्त तमोगुण वाले तथा रजोगुण प्रधान होते हैं ॥७१॥ इसलिए वे अधिक दुःखी तथा बार-बार कर्मो को करने वाले होते हैं । उनके भीतर और बाहर दोनों ओर ज्ञान का प्रकाश होता है । वे साधक मनुष्य ही हैं ॥७२॥ पाँचवे प्रकार का सर्ग अनुग्रह सर्ग है । उस सर्ग के चार भेद हैं विपर्यय सर्ग, सिद्धिसर्ग, शक्तिसर्ग तथा तुष्टिसर्ग ॥७३॥ इसीलिए वे भूतकालिक

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