Srishti Khanda Extracted Page 44
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-44
Sanskrit Original
अवतारेषु यद्रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः । त्वामाराध्य परंब्रह्म याता मुक्तिं मुमुक्षवः ॥३७॥ वासुदेवमनाराध्य को हि मोक्षमवाप्स्यति । यद्रूपं मनसा ग्राह्यं यद्वाह्मं चक्षुरादिभिः ॥३८॥ बुद्या च यत्परिछेद्यां तद्रपमखिलं तव । त्वन्मय्यहं त्वदाधारा त्वत्सृष्टा त्वामुपाश्रिता ॥३९॥ माधवीमिति लोकोयमभिधत्ते ततोहि माम् । एवंसंस्तूयमानस्तु पृथिव्या पृथिवीधरः ॥४०॥ सामस्वरध्वनिःश्रीमान् जगर्ज परिघर्घरम् । ततः समुत्क्षिप्यधरां स्वदंष्ट्या महावराहः स्फुटपद्मलोचनः । रसातलादुत्पलपत्रसन्निभः समुत्थितो नील इवाचलो महान् ॥४ १॥ उत्तिष्ठता तेनमुखानिलाहतं तदा पल्वांभोजनलोकसंश्रयान् । सनंदनादीनपकल्मषान्मुनींश्चकार भूयोपि पवित्रतास्पदम् ॥४ २॥ प्रयांति तोयानि खुराग्रविक्षते रसातलेऽ धः कृतशब्दसंततिः । बलाहकानां च ततिस्तु तस्य श्वासानिलास्ते परितः प्रयाति ॥४३॥ उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकु क्षे महावराहस्य महींविदार्य । विधून्वतो वेदमयं शरीरं रोमांतरस्था मुनयो जुषंति ॥४४॥ जनेश्वराणां परमेश केशव प्रभुर्गदाशंखदरासिचक्रधृक । प्रभूतिनाशस्थिति हेतुरीश्वरस्त्वमेव नान्यत्परमं च यत्पदम् ॥४५॥ पादेषु वेदास्तव यूपदंष्टा दंतेषु यज्ञाःश्रुतयश्च वक्त्रे । हुताशजिह्णोसि तनूरुहाणि दर्भाःप्रभो यज्ञपुमास्त्वमेव ॥४६॥ जो अवतारों में श्रीराम कृष्ण आदि रूप होते हैं देवतागण उसी की आराधना करते हैं । आपकी ही आराधना करके मुमुक्षु पुरुष मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं ॥३७॥ भगवान् वासुदेव की आराधना किए विना कौन मोक्ष प्राप्त कर सकता है ? जिस रूप को मन के द्वारा अथवा किसी चक्षु आदि बाहोन्द्रिय के द्वारा जाना जा सकता है, अथवा जिसे बुद्धि के द्वारा जाना जा सकता है, वे सबके सब आपके ही रूप हैं । में भी आपमय हूँ । आप ही मेरे आधार हैं, आपने ही मेरी सृष्टि की और मैं आपके ही आश्रित हूँ ॥३८-३९॥ इसी से संसार के लोग मुझे माधवी कहते हैं । जिस समय पृथिवी इस प्रकार से श्रीभगवान् की स्तुति कर रही थी उसी समय प्रृथिवी को धारण करने वाले ॥४०॥ ऐश्वर्य सम्पन्न भगवान् सामस्वर की ध्वनि में धर्घर गर्जना किए । विकसित कमल के समान नेत्र वाले महा वराह भगवान् अपने दाँतों से पृथिवी को उठाकर कमलदल के समान कान्ति वाले वे महानीलाचल के समान रसातल से ऊपर आये॥४१॥ ऊपर की ओर आते हुए श्रीभगवान् के मुख की वायु से उछलने वाले जल से जनलोक निवासी भी जीव भींग गये, और उस जल ने निष्पाप सनंदन आदि महर्षियों को और अधिक पवित्र बना दिया ॥४२॥ उनके खुरों से छिद्र हो जाने के कारण ध्वनि करता हुआ जल रसातल से नीचे जाने लगा और उनके मुख की वायु से आहत मेध गण चारो ओर बिखर गये ॥४३॥ एकार्णव से ऊपर आते हुए महाबराह की कुक्षि (पेट) जो भिंग गयी थी उस शरीर को फडफड़ाते समय रोओं में लगे हुए जल ने पृथिवी को फाड़कर मुनियों को पवित्र बना दिया ॥४४॥ स्वामियों के भी सर्वश्रेष्ठ नियामक भगवान् केशव ! गदा, शंख, कृपाण तथा चक्र को धारण करने वाले, सृष्टि, संहार तथा पालन करने वाले ईश्वर तथा परम प्राप्य आप ही हैं, आपसे भिन्न कोई दूसरा नहीं है ॥४५॥ हे प्रभो ! आपके चरणों में वेद का निवास है, आपकी दंष्ट्रा (दाढ) ही यज्ञशाला के यूप हैं, आपके दांतों में यज्ञों तथा मुख में श्रुतियों का
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