Srishti Khanda Extracted Page 43
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-43
Sanskrit Original
भीष्य उवाच ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ कल्पादौ भगवान्यथा ॥२५॥ ससर्ज सर्वभूतानि तदाचक्ष्व महामुने । पुलस्त्य उवाच प्रजा:सर्सर्ज भगवाननादिस्सर्वसंभवः ॥२६॥ अतीतकल्यावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः । सत्वोद्रिक्तस्तथा ब्रह्माशून्यं लोकमवैक्षत॥२७॥ तोयान्तस्स महीं ज्ञात्वा निमग्नां वारिसंपल्वे । प्रविचित्य तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः ॥२८॥ विष्णुरूपं तदा ज्ञात्वा पृथ्वी वोढुं स्वतेजसा। मत्स्यकूर्मादिकां चान्यां वाराहीं तनुमाविशत्॥२९॥ वेदयज्ञमयं रूपमाश्रित्य जगतःस्थितौ । स्थितःस्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः ॥३०॥ प्रविवेश तदा तोयं तोयाधरे धराधरः । निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलमागतम् ॥३१॥ तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुंधरा । पृथिव्युवाच नमस्ते सर्वभूताय नमस्ते परमात्मने ॥३२॥ मामुद्धरास्मादद्य त्वं त्वत्तोहं पूर्वमुत्यिता । परमात्मन् नमस्तेस्तु पुरुषात्मन् नमोस्तुते ॥३३॥ प्रधानव्यक्तरूपाय कालभूताय ते नमः । त्वं कर्त्ता सर्वभूतानां त्वं पाता त्वं विनाशकृत् ॥३४॥ सर्गादौ यः परो ब्रह्मा विष्णुरुद्रात्मरूपधृक् । भक्षयित्वा च सकलं जगत्येकार्णवीकृते ॥३५॥ शेषे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः । भवतो यत्परंरूपं तन्न जानाति कश्चन ॥३६॥ भगवान् नारायण नामक ब्रह्माजी जिस प्रकार से कल्प के प्रारम्भ में ॥२५॥ सभी भूतों की सृष्टि किए उसे आप मुझे बतलायें । महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- सर्वसम्भव, अनादि भगवान् ब्रह्माजी ने प्रजाओं की सृष्टि की ॥२६॥ बीते हुए कल्प के अन्त में रात्रि के समय सोने के बाद जगे हुए ब्रह्माजी ने सत्त्वगुण के उद्रिक्त हो जाने से सम्पूर्ण लोकों को शुन्य देखा ॥२७॥ उन्होंने जान लिया कि एकार्णव के जल में पृथिवी डूब गयी है, इस तरह से विचार करके पृथिवी का उद्धार करने की इच्छा से प्रजापति अपने विष्णुरूप को जानकर अपने तेज से पृथिवी का वहन करने के लिए मत्स्य, कूर्म, वाराह इत्यादि शरीर के भीतर प्रवेश किए ॥२९॥ उसके बाद वे यज्ञमय शरीर को धारण करके जगत् की स्थिति (रक्षण) काल में सुदृढ शरीर वाले वे सर्वात्मा स्थित रहते हैं । वे ही प्रजापति परमात्मा वाराह शरीर को धारण किए ॥३०॥ पृथिवी को धारण करने वाले वे एकार्णव के जल में प्रवेश किए । पाताल में आये हुए श्रीभगवान् को देखकर पृथिवी देवी ने ॥३१॥ भक्ति की भावना से विनम्र होकर श्रीभगवान् की स्तुति की । पृथिवी देवी ने कहा-- सर्वभूतस्वरूप, परमात्मा को नमस्कार है ॥३२॥ हे भगवान् आज आप यहाँ से मेरा उद्धार करें । पूर्वकाल में आपने ही मेरी रचना की थी हे परमात्मन् ! हे पुरुष स्वरूप भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥३३॥ आप ही प्रधान (प्रकृति) व्यक्त तथा काल स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है । आप ही समस्त भूतों की सृष्टि करने वाले, रक्षा करने वाले तथा संहार करने वाले हैं ॥३४॥ आप ही सृष्टि आदि कार्यों को रने के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र रूप को धारण करते हैं; और जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव (एक महा समुद्ररूप) हो जाता है, उस समय आप जगत् का भक्षण कर लेते हैं ॥३५॥ और हे गोविन्द ! उस समय आप ही शेष की शय्या पर शयन करते है और मनीषी जन आपका ध्यान करते रहते हैं । आपका जो पर रूप है उसको कोई भी नहीं जान पाता है ॥३६॥ आपके
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