Srishti Khanda Extracted Page 42

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-42

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Sanskrit Original

युगाख्यःस तु विज्ञेयः कृतत्रेतदिसंज्ञितः। कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैव चतुर्युगम्॥९९॥ प्रोच्यते तत्सहस्नं तु ब्रह्मणो दिवसं नृप । ब्राणो दिवसे राजनूमनवश्च चतुर्दश ॥१२॥ भवंति परिमाणं च तेषां कालकृतं श्ृणु। सप्तर्षयः सुराःशक्रो मनुस्तत् सूनवो तृप ॥१३॥ एककाले हि सृज्यंते संह्लियंते च पूर्ववत्। चतर्युगानां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः ॥१४॥ मन्वंतरं मनोःकालःसुरादीनां च पार्थिव। अष्टौशतसहस्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतः ॥९५॥ द्विपंचाशतधान्यानि सहस्राण्यधिकानि च । त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताःसंख्यया नृप ॥१६॥ सप्तषष्टिस्त तथान्यानि नियुतानि महामते। विंशतिश्च सहस्राणि कालोयमधिकं विना ॥१७॥ मन्वंतरस्य संख्येयं मानुषैरिह वत्सरैः । चतुर्दशगुणो होष कालो ब्राहामहः स्मृतम् ॥१८॥ ब्राह्मो नैमित्तिको नाम तस्यांते प्रतिसंचरः । तदाहि दह्यते सर्व त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम् ॥१९॥ जनं प्रयांति तापार्ता महरलोकनिवासिनः । एकार्णवे तु त्रैलोक्ये ब्रह्मा ब्रह्माविदांवरः ॥२०॥ भोगिशय्यागतःशेते त्रैलोक्यग्रासब्रृहितः । जनस्थैरयोगिभिर्हेवश्चित्यमानो जगद्विभुः ॥२९॥ तत्प्रमाणा हि तां रात्रिं तदंते सृजतेपुनः । एवं तु ब्रह्मणो वर्षमेवं वर्षशतं च तत् ॥२२॥ शतं हि तस्य वर्षाणां परमायुर्महात्मनः। एकमस्य व्यतीतं तु परार्धं ब्रह्मणोनघ ॥२३॥ तस्यान्ते भून्महाकल्पः पाद्य इत्यभिविश्रुतः । द्वितीयस्य परार्धस्य वर्तमानस्य वै नृप ॥२४॥ वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकल्पितः । (नृपश्रेष्ठ) सन्ध्या और सन्ध्यांश के बीच का जो काल होता है ॥१०॥ उसी काल को सत्ययुग, त्रेतायुग आदि के नाम से कहा जाता है । सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग इन चारों को मिलाकर एक चतुर्युग होता है॥११॥ हे राजन् ! एक हजार चतुर्युगों का ब्रह्माजी का एक दिन होता है । राजन् ! ब्रह्माजी के एक दिन में चौदह मनुओं का समय बीत जाता है ॥१२॥ राजन् ! सप्तर्षि, देवता, इन्द्र, मनु तथा मनु के पुत्र ये सब के सब एक ही समय में सृजित होते हैं और एक ही साथ इन सबों का संहार भी होता है । अब इन सबों के कालकृत परिमाण को तुम सुनो । एकहत्तर चतुयुर्गो से कुछ अधिक काल का एक मन्वन्तर होता है ॥१३-१४॥ प्रत्येक मनुओं तथा उस मन्वन्तर के प्रधान देवाताओं आदि का काल (आयु) एक मन्वन्तर ही होता है । एक मन्वन्तर का काल आठ लाख बावन हजार (८५२०००) दिव्य वर्षो का होता है । यह समय मनुष्यों की वर्ष गणना के अनुसार तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षों का होता है । और इसके चौदह गुना बड़ा ब्रह्माजी का दिन होता है ॥१५-१८॥ ब्रह्माजी के दिन के अन्त में नैमित्तिक नामक ब्राह्म प्रतिसञ्चर (प्रलय) होता है । इस प्रलय में भूलोक, भुवलॉक और स्वलोक ये तीनों लोक जलकर भस्म हो जाते हैं ॥१९॥ उसके संताप से संतप्त होकर महलोंक निवासी जीव जनलोक में चले जाते हैं । त्रैलोक्य के एकार्णव हो जाने पर ब्रहाज्ञानियों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ॥२०॥ त्रैलोक्य को उपसंहृत करके शेष की शय्या पर शयन करते हैं । उस समय जनलोक में रहन वाले योगी जीव उनके स्वरूप का चिन्तन (ध्यान) करते रहते हैं ॥२१॥ ब्रह्माजी का जितना बड़ा दिन होता है, उनकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी होती है । रात्रि के अन्त में जगकर वे पुनः सृष्टि करते हैं । इसीतरह ब्रह्माजी का वर्ष तथा उनकी सौ वर्ष की आयु होती है ॥२२॥ महात्मा ब्रह्माजी की आयु उनके मान से सौ वर्ष की ही होती है । उसे परमायु कहते हैं । हे अनघ भीष्मजी ! ब्रह्माजी का एक परार्ध बीत चुका है ॥२३॥ उस प्रथम पराद्ध के अन्त में पाद्म कल्प हुआ था ऐसा सुना जाता है ।हे राजन्! यह तो ब्रह्माजी का द्वितीय परार्ध चल रहा है ॥२४॥ उसका यह वाराह नामक प्रथम कल्प है । हे महामुने!

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