Srishti Khanda Extracted Page 39
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-39
Sanskrit Original
एकादशम्मनश्चात्र देवा वैकारिकाः स्मृताः । त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमत्र च पंचमम् ॥९९॥ ऐतेषां तु मतं कृत्यं शब्दादिग्रहणं पुनः । वाक् पाणिपादपायूनि चोपस्थं तत्र पञ्चमम् ॥९००॥ विसर्गशिल्परात्युक्तिर्गुणा एषां विपर्ययात् । आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा ॥९०१॥ शब्दादिभिर्गुर्णैवीर यक्तानीत्युतरोत्तरैः । शांताघोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः॥९०२॥ नानावीर्याः पृथग्भूतास्तत स्तेसंहतिं विना । नाशकुवम्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्त्रशः ॥१०३॥ समेत्यान्योन्यसंयोगात् परस्परसामाश्रयात्। एकसंघातलक्षाश्च संप्राप्यैक्यमशेषतः ॥९ ० ४॥ पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च व्यक्तानुग्रहणे तथा। महदादयो विशेषांता हांडमुत्पादयंति वै॥१०५॥ तत्क्रमेण विवृत्तं तु जलबुदबुदवत्समम् । तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ व्यक्तरूपी जनार्दनः ॥१०६॥ ब्रह्मा ब्रह्मस्वरूपेण स्वयमेव व्यवस्थितः । मेरुरुल्बमभूत्तस्य जरायुश्चमहीधराः ॥ ९ ०७॥ गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासंश्च महात्मनः । तत्र द्वीपास्समुद्रा्च सज्योतिरलोकसंग्रहः ॥१०८॥ जन्य बतलाया गया है, और उन इन्द्रियों के अधिष्ठातृ दश देवताओं ॥९८॥ और ग्यारहवाँ मन ये ग्यारह वैकारिक (सात्त्विक) कहे गये हैं । ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं त्वक्, चक्षु, नासिका, जिह्वा तथा पाँचवा श्रोत्र ॥९९॥ (यहाँ ध्यान देना चाहिए कि चक्षु इत्यादि के भीतर रहने वाला एक अतीद्रिय द्रव्य है, जिसे इन्द्रिय शब्द से कहा जाता है । चक्षु इत्यादि तो इन्द्रियों के आश्रय मात्र हैं क्योंकि देखा जाता है कि श्रोत्र के बने रहने पर श्रोतरेन्द्रिय विनष्ट हो जाती है। उसी के कारण मनुष्यों में बाधिर्य दोष आता है ।) इन पाश्ओो ज्ञानेन्द्रयों का कार्य शब्द आदि विषयों का ग्रहण करना है । (श्रोत्रेन्द्रिय के द्वारा शब्द का ग्रहण होता है, त्वगिन्द्रय के द्वारा स्पर्श का ज्ञान होता है, चक्षरिन्द्रिय के द्वारा रूप का ग्रहण होता है, रसनेन्द्रिय के द्वारा रस का ग्रहण होता है तथा घ्राणेन्द्रिय के द्वारा गन्ध का ग्रहण होता है ।) कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच है-- वाक्, पाणि, पाद, पायु (मल त्याग करने वाली इन्द्रिय) तथां उपस्थ (लिङ्ग) ॥१००॥ पायु इन्द्रिय का काम मल का त्याग करना है, पाणीन्द्रिय का काम शिल्प क्रिया का सम्पादन है । पादन्द्रिय के द्वारा गति (चलना फिरना) होती है, वागिन्द्रिय का कार्य उक्ति (शब्दोच्चारण) है इसके विपरीत हे वीर, आकाश, वायु, तेज, जल तथा पृथिवी ये पाँचों भूत ॥१०१॥ शब्दादि उत्तरोत्तर गुणों से युक्त होते हैं । (अर्थात् आकाश केवल शब्द गुण से युक्त होता है, वायु के शब्द एवं स्पर्श ये दो गुण हैं तेज में तीन गुण पाये जाते है, शब्द, स्पर्श एवं रूप, जल में चार गुण होते हैं, शब्द स्पर्श, रूप एवं रस और पृथिवी में पाँच गुण पाये जाते हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध) ये सभी भूत पहले शान्त, घोर एवं मूढ होते हैं; (अर्थात् सुख-दुख एवं मोह प्रद होते है) अतएव विशेष कहलाते हैं ॥१०२॥ ये अलग-अलग अनेक प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न होते हैं किन्तु अच्छी तरह से एकत्रित (परस्पर में मिले हुए) न होने के कारण ये प्रजां की सृष्टि नहीं कर सके ॥१०३॥ परस्पर में एक दूसरे के संयोग को (पञ्जीकरण प्रक्रिय के द्वारा) प्राप्त करके, जिन सबों का लक्ष था एक संघात रूप से परिणत हो जाना, वैसा पूर्णरूप से होकर वे ॥१०४॥ पुरुष परमात्मा से अधिष्ठित तथा व्यक्त (महदादि) के द्वारा अनुगृहीत होकर, महत् तत्त्व से लेकर विशेष पर्यन्त सभी मिलकर ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करते हैं ॥१०५॥ वे क्रमश: जल में उत्पन्न होने वाले बुलबुले के समान विवर्तित हो गये । उस ब्रह्माण्ड में अव्यक्त स्वरूप वाले भगवान् जनार्दन ब्रह्मा रूप से, स्थित हो गये । उनका उल्ब (गर्भ के ऊपर लिपटी रहने वाली झिल्ली) सुमेरु पर्वत हो गया और दूसरे पर्वत जरायु बन गये ॥१०६-१०७॥ उन महात्मा के गर्भोदक का काम समुद्रों ने किया । उसी में द्वीप, समुद्र, तेज तथा लोक समूह विद्यमान रहे ॥१०८॥ हे भीष्म ! उसी अण्ड से देवता, असुर और मनुष्य उत्पन्न हुए । वह ब्रह्माण्ड उत्तरोत्तर दश
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know