Srishti Khanda Extracted Page 38
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-38
Sanskrit Original
पुलस्त्य उवाच पर: पराणां परमः परमात्मा पितामहः । रूपवर्णादिरहितो विशेषण विवर्जितः ॥८४॥ अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामद्धिजन्मभिः । गुणैर्विवर्जितः सर्वैः स भातीति हि केवलम्॥८५॥ सर्वत्रऽसौ समश्चापि वसन्ननुपमोमतः । भावयन्ब्रह्मरूपेण विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥८६॥ तं गुहा परमं नित्यमजमक्षयमव्ययम् । तथापुरुषरूपेण कालरूपेण संस्थितम् ॥८७॥ तं नत्वाहं प्रवक्ष्यामि यथा सृष्टिं चकार ह। पूर्वं तु पद्मशयनादुत्याय जगतः प्रभुः ॥८८॥ गुणव्यंजनसंभूतः सर्गकाले नराधिप। सात्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान् ॥८९॥ प्रधानतत्वेन समं तथा वीजादिभिर्वृतः । वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः ॥९०॥ त्रिविधोयमहंकारो महत्तत््वादजायत। भूतेद्रियाणां पंचानां तथा कर्मेद्रियैः सह ॥९९॥ पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। एकैकशः स्वरूपेण कथयामि यथोत्तरम्॥९२॥ शब्दमात्रमथाकाशं भूतादिः खं समावृणोत्। अथाकाशं विकुर्वाणं स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ॥९३॥ बलवानेष वै वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः।आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रंसमावृणोत् ॥९४॥ ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह। ज्योतीरूपन्तु तद्दायुस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥९ ५॥ स्पर्शरूपस्तु वै वायूरूपमात्रं समावृणोत् । ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह ॥९६॥ संभवंति ततोंभांसि रूपमात्रं समावृणोत् । विकुर्वाणानि चांभांसि गंधमात्रं ससर्जिरे॥९७॥ संघातो जायतेतस्मात्तस्य गंधो मतो गुण: । तैजसानीद्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश॥९८॥ से रहित तथा समस्त सत्त्व आदि गुणों से रहित हैं । वे केवल प्रतीत मात्र होते हैं ॥८५॥ वे सभी वस्तुओं में समान रूप से निवास करते हैं । वे स्वेतर समस्त वस्तुओं से भिन्न हैं । वे अपने को ब्रह्म रूप से अनुभव करते हैं, इसीलिए विद्वज्जन उन्हें ब्रह्मा कहते हैं ॥८६। परम रहस्यमय, नित्य, अजन्मा, अक्षय अव्यय तथा पुरुष रूप से एवं काल रूप से रहने वाले उन ब्रह्माजी को प्रणाम करके मैं बतलाता हूँ कि उन्होंने किस प्रकार से सृष्टि की । जगत् के स्वामी वे सृष्टि के काल उपस्थित होने पर हे राजन् ! अपने कमल रूपी शय्या से जगकर सर्वप्रथम ॥८७-८८॥ गुणरूपी अभिव्यञ्जक से उत्पन्न होने वाले सात्त्विक, राजस एवं तामस इन तीन प्रकार के महत्त्व की सृष्टि किए॥८९॥ उसको प्रधान तत्त्व के साथ बीज आदि ने आच्छादित किया, उसके कारण विकृत होकर उस महत् तत्त्व से तीन प्रकार के अहङ्कारो की सृष्टि हुयी-- वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) तथा भूतादि (तामस) ॥९०॥ ये तीनों प्रकार के अहङ्कार महत्तत्व से उत्पन्न हुए । इसके बाद मैं पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्च कर्मेन्द्रियों केसाथ ॥९ १॥ परथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश इन सबों के उत्तरोत्तर उत्पत्ति का स्वरूप बतलाता हूँ ॥९२॥ इसके बाद तामस अहंङ्कार ने शब्द तन्मात्रा तथा आकाश को आच्छादित किया, उससे विकृत होकर आकाश ने स्पर्श तन्मात्रा को उत्पन्न किया ॥९३॥ इस बलवान् वायु का गुण स्पर्श है । उसके बाद आकाश और शब्द तन्मात्रा दोनों ने स्पर्श तन्मात्रा को आवृत (आच्छादित) किया ॥९४॥ उसके कारण विकृत होकर वायु ने रूप तन्मात्रा को उत्पन्न किया । तेज स्वरूप उस वायु का गुणरूप है ॥९५॥ स्पर्श स्वरूप उस वायुने उस रूप तन्मात्रा को आवृत किया, उसके कारण विकृत होकर तेज ने भी रसतन्मात्रा की सृष्टि की ॥९६॥ उससे ,जलों की उत्पत्ति हुयी । उन जलों ने रूप तन्मात्रा को समावृत किया उसके कारण विकृत होकर जलों ने गन्ध तन्मात्रा की सृष्टि की ॥९७॥ चूकि उससे संघात (काठिन्य) की उत्पत्ति होती है, इसीलिए उस संघात स्वरूप पृथिवी का गुण गन्ध ही है । इन्द्रियों को तैजस अहङ्कार
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