Srishti Khanda Extracted Page 37
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-37
Sanskrit Original
र्र श्रीपद्ममहापुराण सर्षपैश्च॒ दधिक्षौद्रैर्यवैश्चपयसा सह । अष्टांगो होष निर्दिष्टो हार्घो हि मुनिभिः पुरा ॥७३॥ श्रुत्वैतद्धचन॑ तस्य भीष्मस्यामिततेजसः । उपविष्टो ब्रह्मसुतः पुलस्त्यो भगवानृषिः ॥७४॥ विष्टरं सह पाद्येन अर्घपात्रं मुदान्वितः । जुजोष भगवान्प्रीत सदा चारेण तेन तु॥७५॥ पुलस्त्य. उवाच सत्यवान्दानशीलोसि सत्यसंधिनरिश्वरः । ह्वीमाम्मैत्रः क्षमाशीलो विक्रांत शत्रुशासने ॥७६॥ घर्मञ्ञस्त्वं कृतज्ञस्त्वं दयावाम्प्रियभाषिता । मान्यमानयिताविज्ञो ब्रह्मण्यः साधुवत्सलः ॥७७॥ ु ष्टस्तेहं सदा वत्स प्रणिपातपरस्य वै । प्रब्रूहि त्वं महाभाग कथनं ते वदाम्यहम् ॥७८॥ भीष्म उवाच भगवन् भगवान् ब्रह्मा कस्मिन् काले स्थितो विभुः। सृष्टिं चकार वै पूर्वं देवादीनां वदस्व मे ॥७९॥ स्थितिं वा भगवान्विष्णुः कथं रुद्रस्तुनिर्मितः । कथं वा ऋषयो देवास्सृष्टास्तन महात्मना ॥८०॥ कथं पृथ्वी कथं व्योम कथं चेमे तु सागराः । कथं द्वीपाः पर्वताश्च ग्रामारण्यपुराणि च ॥८९॥ मुनीन्प्रजापतीश्चैव सप्तर्षीन् प्रवरानपि । वर्णान् वायुं पुरा स्थानं गंधर्वान्यक्षराक्षसान् ॥८ २॥ तीर्थानि सरितो वाथ सूर्यादीन् ग्रहतारकान् । यथा ससर्ज भगवांस्तथा मेत्वं वदस्व ह॥८३॥ हाथों से निर्माण किया है; इसे आप ग्रहण करें । उसके बाद पलाश पत्र से निर्मित अर्ध्यपात्र में दूर्वा, अक्षत, पुष्प, कुश, सरसो, दधि, मधु, यव तथा दुग्ध मिश्रित मुनियों के द्वारा निर्दिष्ट इस अष्टाङ्ग अर्ध्य को स्वीकार करें ॥७२-७३॥ निःसीम तेजः सम्पन्न भीष्मजी की वाणी को सुनकर ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि पुलस्त्य ने आसन ग्रहण किया॥७४॥। पाद्य के साथ विष्टर को प्राप्त करके भीष्मजी के द्वारा प्रदत्त सदाचारानुसार अर्घ्यपात्र को ग्रहण करके महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥७५॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा हे वत्स ! तुम सत्यवक्ता, दानशील, सत्याभिसन्धि वाले, नरेश्वर, लज्जायुक्त सबों को मित्र की दृष्टि से देखने वाले, क्षमाशील तथा शत्रुओं को परास्त करने में समर्थ हो॥७६॥ तुम धर्मो के ज्ञाता, कृतज्ञ, दयालु, प्रिय बोलने वाले, सम्मानीय पुरुषों का सम्मान करने वाले, ज्ञानी, ब्राह्मण भक्त तथा साधु वत्सल हो ॥७७॥ तुम प्राणिपात परायण हो, अतएव मैं तुम से प्रसन्न हूँ । तुम अपनी अभिलाषा बतलाओ; उसे मैं पूरा करूँगा ॥७८॥ भीष्मजी ने कहा-- हे भगवन् ! भगवान् ब्रह्माजी ने किस समय में स्थित रहकर सृष्टि करने का काम किया ? उन्होंने सबसे पहले देवताओं की सृष्टि कैसे की 2॥७९॥ अथवा उन्होंने किस स्थिति में भगवान् रुद्र की सृष्टि की ? अथवा उन्होंने देवताओं तथा ऋषियों की सृष्टि कैसे की?॥८०॥ उन्होंने किस प्रकार पृथिवी, आकाश तथा सागरों की सृष्टि की ? किस प्रकार से उन्होंने द्वीपों, पर्वतों, ग्रामों अरण्यों तथा नगरों की सृष्टि की ?॥८१॥ मुनियों, प्रजापतियों, सप्तर्षियों तथा श्रेष्ठ मुनियों की रचना कैसे की ?। वर्णों, वायु, प्राचीन स्थानों, गन्धो, यक्षों एवं राक्षसों की सृष्टि कैसे की ?॥८२॥ तीर्थो, नदियों, सूर्य आदि ग्रहों तथा तारों की उन्होंने कैसे सृष्टि की ? भगवान् ब्रह्माजी ने इन सबों की जिस प्रकार से सृष्टि की है, उसे आप हमें बतलाने की कृपा करें ॥८३॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- ब्रह्माजी समस्त श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ हैं । वे परमात्मा हैं । विशेष रूप से वे रूप तथा वर्ण से रहित हैं ॥८४॥ वे हास (अपक्षय) विनाश, परिणाम, समृद्धि तथा जन्म आदि
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