Srishti Khanda Extracted Page 36

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-36

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Sanskrit Original

यस्मिन्स्थाने यथा दृष्टः पुलस्त्यो भगवानृषिः । तन्नो वद महाभाग कल्याः स्मश्रवणे वयम् ॥५८॥ सूत उवाच यत्र गंगामहाभागा साधूनां हितकारिणी । विभिद्यापर्वतं वेगान्निः सृता लोकपावनी ॥५९॥ गंगाद्वारे महातीर्थे भीष्मः पितृपरायणः । शुश्रुषुःसुचिरं कालं महतां नियमे स्थितः ॥६०॥ यावद्वर्षशतं साग्रं परमेण समाधिना । ध्यायमानः परं ब्रह्म. त्रिकालं स्नानमाचरत्॥६ १॥ पितृन्दवांस्तर्पयतः स्वाध्यायेन महात्मनः । आत्मानं कर्षत श्चास्य तुष्टो देवः पितामहः ॥६ २॥ उवाच तनयं ब्रह्मा पुलस्त्यमृषिसत्तमम्। सत्वां देवव्रतं भीष्मं वीरं कुरु कुलोद्भवम् ॥६३॥ तपसः संनिवर्त्तस्व कारणं चास्य कीर्त्य । पितृन्भक्तया महाभागो ध्यायमानस्समास्थितः ॥६४॥ यो ह्यस्य मनसः कामस्तं संपादय माचिरम्। पितामहवच श्रुत्वा पुलस्त्योभुनिसत्तमः ॥६५॥ गंगाद्वारमथागत्य भीष्मं वचनमव्रवीत् । वरं वरय भत्रं ते यत्ते मनसि वर्त्तते ॥६६॥ ु ष्टस्ते तपसा वीर साक्षाद्देवः पितामहः । ब्रह्मणा प्रेषितस्ते हं वरान्दास्यामि कांक्षितान् ॥६७॥ भीष्मोपि तद्वचः श्रुत्वा मनः श्रोत्रसुखावहम्। उन्मील्य नयने दृष्ट्वा पुलस्त्यं पुरतः स्थितम् ॥६८॥ अष्टांगप्रणिपातेन नत्वा तं मुनिसत्तमम् । उवाच प्रणतो भूत्वा सर्वागालिंगितावनिः॥६९॥ अद्य मे सफलं जन्मदिनं चेदं सुशोभनम् । भवतश्चरणो दुष्टौ जगद्वंद्यौ मया त्विह ॥७०॥ तपसश्च फलं प्राप्तं यद् दृष्टोभगवान्मया । वरप्रदो विशेषेण संप्राप्तश्च नदीतटे ॥७ १॥ इयं बृसी मया क्लृप्ता अस्यतां सुखदाकृता । अर्ध्यपात्रे तु पालाशे ू र्वाक्षतसुमैः कुशैः ॥७२॥ कि भीष्मजी को किस स्थान पर तथा किस प्रकार से महर्षि पुलस्त्य का दर्शन मिला ? हमलोग इसको सुनने के लिए उत्कण्ठित हैं ॥५८॥ सूतजी ने कहा-- जहाँ पर साधु पुरुषों का कल्याण करने वाली महाभागा गङ्गाजी पर्वत को तोड़कर वेगपूर्वक पृथिवी पर अवतरित हुयी हैं ॥५९॥ उस महान् तीर्थ गङ्गाद्वार (हरिद्वार) में पितृभक्त भीष्मजी ज्ञानोपदेश प्राप्त करने की इच्छा से दीर्घकाल पर्यन्त महापुरुषों के नियम का पालन कर रहे थे ॥६०॥ वे सौ वर्ष से अधिक काल तक वहाँ समाधिस्थ होकर परं ब्रह्म का ध्यान करते हुए त्रिकाल स्नान करते थे ॥६१॥ वेदाध्ययन करते हुए पितरों का तर्पण तथा देवताओं की आराधना करते थे । इसतरह से अपने शरीर का शोषण करने वालेभीष्मजी को देखकर ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये ॥६२॥ उन्होंने ऋषियों में श्रेष्ठ तथा अपने मानस पुत्र महर्षि पुलस्त्य से कहा- तुम कुरुवंश के वीर देवव्रत भीष्म को ॥६३॥ उनके पास जाकर उन्हें तपस्या करने से रोको और उनको कारण तत्त्व का उपदेश करो । अपने पितरों की भक्ति से परिपूर्ण होकर वे महाभाग वहाँ पर निवास करते हैं ॥६४॥उनके मन में जो कामना हो उसको शीघ्र पूरा करो । ब्रह्माजी की वाणी को सुनकर मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यजी ॥६५॥ गङ्गद्वार में आकर भीष्मजी से कहे हे भद्र ! तुम्हारी जो इच्छा हो उस वरदान को माँग लो ॥६६॥ हे वीर ! तुम्हारी तपस्या से साक्षात् ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये हैं । मुझे ब्रह्माजी ने भेजा है, मैं तुम्हें अभिलषित वर प्रदान करूँगा ॥६७॥ कानों को सुख देने वाली उस वाणी को सुनकर भीष्मजी ने भी अपनी आँखों को खोलकर देखा कि उनके सामने महर्षि पुलस्त्य खड़े हैं ॥६८।। उसके बाद उन महर्षि को साष्टाङ्ग प्रणाम करके अत्यन्त विनम्र होकर जिनके सभी अङ्गों में घूल लगी थी वे भीष्मजी कहे ॥६९॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया । आज का दिन मेरे लिए अत्यन्त कल्याणकारी है, क्योंकि मैंने आज आपके इन लोकवंद्य चरणों का दर्शन किया है ॥७०॥ मुझे तपस्या का फल प्राप्त हो गया, क्योंक आप मुझे नदी के तट में वरदान देने के लिए पधारे हैं ॥७१॥ मैने इस सुखप्रद आसन का अपने

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