Srishti Khanda Extracted Page 35

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-35

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण प्रयागे मुनिवर्यैश्च यथा पृष्टः स्वयंप्रभुः। कृष्णेन चानुशिष्टास्ते मुनयो थर्मकांक्षिण: ॥४४॥ एतत्सर्वं यथा तत्वमाख्यातं इ्विजसत्तमाः । मुनिनां धर्मनित्यानां लोकतंत्रमनुत्तमम् ॥४५॥ ब्रह्मणा यत्पुरा प्रोक्तं पुलस्त्याय महात्मने । पुलस्त्येनाथभीष्माय गंगाद्वारे प्रभाषितम्॥४६॥ धन्यं यशस्यमायुष्यं सर्वपापप्रणाशनम् । कीर्तनं श्रवणं चास्य धारणं च विशेषतः ॥४७॥ सूतेनानुक्रमेणेदं पुराणं संप्रकाशितम्। ब्राह्मणेषु पुरा यच्च ब्रह्मणोक्तं सविस्तरम् ॥४८॥ पाद्धस्य विदनूसम्यग्योधीयीत जितेन्द्रियः । तेनाधीतं पुराणं स्यात्सर्वं नास्त्यत्र संशयः ॥४९॥ योविद्याच्चतुरो वेदान् सांगोपनिषदो द्विजः । पुराणं च विजानाति यः स तस्माद्विचक्षणः॥५०॥ इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृहयेत्। विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रतारिष्यति ॥५९॥ अधीत्य चैकमध्यायं स्वयं प्रोक्तं स्वयंभुवा । आपदः प््राप्यमुच्येत यथेष्टां प्राप्नुयाद्वतिम् ॥५२॥ पुरा परंपरां वक्ति पुराणं तेन वै स्मृतम् निरुक्तिमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥५३॥ ऋषयो हाब्रुवन् सूतं कथं भीष्मेण सङ्गतः । ब्रह्मणो मानसः पुत्रः पुलस्त्यो भगवात्रृषिः ॥५४॥ दुर्लभं दर्शनं यस्य नरैःपापसमन्वितैः । अत्याश्चर्यमिदं सूत क्षत्रियेण कथं मुनिः ॥५५॥ आराधितो बृहदभूतस्तन्नो वद महामते । कीदृशं वा तपस्तेन कोवान्यो नियमः कृतः॥५६॥ येन तुष्टो मुनिर्ब्राह्मस्तथा तेन प्रभाषितः। पर्ववाप्यथपर्वार्ध समग्रं वा प्रभाषितम्॥५७॥ से जैसा प्रश्न किया और उन्होंने जो उसका उत्तर धर्म जिज्ञासु मुनियों को दिया, उसका वर्णन किया गया है ॥|४३-४४॥ हे मुनिवर्यो ! इन सारी बातों का वर्णन इसमें (सृष्टि खण्ड में) किया गया है । निरन्तर धर्मनिष्ठ मुनियों के अनुपमेय लोकसंग्रह का उपदेश, महर्षि पुलस्त्य को ब्रह्माजी ने दिया उसका वर्णन इसमें किया गया है और उन्होंने उसका उपदेश भीष्म को जो हरिद्वार में दिया है, उसका वर्णन.इसमें किया गया है ॥४५-४६॥ इस पुराण का कीर्तन, श्रवण तथा विशेष रूप से धारण यश तथा आयु को प्रदान करता है तथा सभी पापों का विनाश करता है ॥४७॥ सूतजी ने इस पुराण का इसी क्रम से प्रकाशन किया है । सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने इसका विस्तार पूर्वक उपदेश ब्राह्मणों को दिया ॥४८॥ जो व्यक्ति जितेन्द्रिय रहकर इसके एकचरण का भी अध्ययन करता है, उसको सम्पूर्ण पुराण के पढने का फल प्राप्त होता है ॥४९॥ पुराणों का ज्ञाता पुरुष अड्डों तथा उपनिषदों के साथ चारो वेदों के ज्ञाता पुरुष की अपेक्षा अधिक निपुण होता है ॥५०॥ वेद का उपबृंहण (व्याख्यान) इतिहास और पुराण के आलोक में करना चाहिए, अल्पज्ञ व्यक्ति से वेद इसलिए भयभीत रहता है कि वह कहीं मेरा अपार्थ न कर दे ॥५१॥ स्वयं ब्रह्माजी के द्वारा जिसका उपदेश किया गया है, ऐसे पंद्मपुराण के एक अध्याय का भी पाठ करके मनुष्य आयी हुयी विपत्ति से मुक्त हो जाता है और अपने अभिप्रेत गति को प्राप्त कर लेता है ॥५२॥ प्राचीन परम्परा का उपदेश करने के ही कारण पुराणों को पुराण कहते है; पुरण शब्द की इस व्युत्पत्ति को जानने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥५३॥ ऋषियों ने सूतजी से पूछा कि ब्रह्माजी के मानस पुत्र ऋषि (क्रान्त द्रष्टा) भगवान् पुलस्तय महर्षि की भीष्म से भेंट कैसे हुयी ॥५४॥ हे महामत्ते! आप हमलोगों को यह बतलाइये कि पापी मनुष्य जिनका दर्शन भी नहीं प्राप्त कर सकता है उन महर्षि को क्षत्रिय भीष्म ने किस तरह प्राप्त किया ? और उनकी सविधि आराधना की ? यह तो अत्यन्त आश्चर्य की बात है । उस भीष्मजी ने कौन सी ऐसी तपस्या अथवा नियम का पालन किया था 2॥५५-५६॥ जिससे प्रसन्न होकर मुनि उनको इस पुराण का उपदेश दिए ?। उन्होंने भीष्मजी को इस पुराण का एक पर्व या: ' अथवा आधा पर्व सुनाया ? या इस सम्पूर्ण पुराण को सुनाया ?॥५७॥ हे महाभाग ! हमलोगों को आप यह बतलायें

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