Srishti Khanda Extracted Page 34

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-34

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Sanskrit Original

संकीर्त्यते मया चात्र पापानां रौरवादयः । सर्वेषामेव सत्वानां परिणामविनिर्णयः ॥३२॥ ब्रह्मणः प्रतिसर्गश्चसर्वसंहारवर्णनम्। कल्पे कल्पे च भूतानां महतामपि संक्षयः ॥३३॥ सुसंख्याय च बुद्ध्वा वै ब्रह्मणश्चाप्यनित्यताम्। दौरात्म्यं चैव भोगानां संसारस्य च कष्टताम् ॥३४॥ दुर्लभत्वं च मोक्षस्य वैराग्याद्दोषदर्शनम् । व्यक्ताव्यक्तं परित्यज्य सत्वं ब्रह्मणि संस्थितम्॥३५॥ नानात्वदर्शनात् सुस्थस्ततस्तदभिवर्त्तते । ततस्तापत्रयातीतो विरूपाख्यो निरंजनः ॥३५॥ आनंदं ब्रह्मणः प्राप्तो नबिभेति कुतश्चन । इति कृत्यसमुद्देशः प्रमाणस्योपवर्णितः ॥३६॥ कीर्त्यते जगतो यत्र सर्गप्रलय विक्रियाः । प्रवृत्तिश्चापि भूतानां निवृत्तीनां फलानि च ॥३७॥ प्रादुर्भावो वसिष्ठस्य शक्तेर्जन्म तथैव च । सौदासान्निग्रहस्तस्य विश्वामित्रकृतेन च ॥३८॥ पराशरस्य चोत्पत्तिरदृश्यन्त्यां यथा विभोः। जज्ञे पितृणां कन्यायां व्यासश्चापि यथा मुनि: ॥३९॥ शुकस्य च यथा जन्म पुत्रस्य सह धीमतः। पराशरस्य विद्वेषो विश्वामित्रकृतो यथा ॥४०॥ वसिष्ठसंभृतश्चाम्निर्विश्वामित्रजिघांसया । संधानहेतोर्विभुना जीर्णः कण्वेन धीमता॥४९॥ देवेन विप्रविप्राणां विश्वामित्रहितेषिणा । एकं वेदं चतुःपादं चतुर्धा पुनरीश्वरः॥४२॥ यथा विभेद भगवान्व्यासः सर्वेष्वनुग्रहात्। तस्य शिष्यप्रशिष्यैश्च शाखाभेदाः पुनः कृता: ॥४३॥ वर्णन किया गया है ॥३०॥ इसके बाद विशेष रूप से ब्रह्माजी की संध्या और संध्यांश का वर्णन है । उसके बाद भूतों तथा सातो लोकों का वर्णन किया गया है ॥३१॥ यहाँ पर मैं सभी जीवों द्वारा किए जाने वाले सभी पापों के परिणाम स्वरूप रौरव आदि नरकों का वर्णन करूंगा ॥३२॥ उसके बाद मैं सबों के संहार स्वरूप ब्रह्माजी के प्रतिसर्ग (प्रलय) का वर्णन करूँगा । प्रत्येक कल्पों में होने वाले महाभूतों के भी संक्षय का मैं वर्णन करूँगा ॥३३॥ अपनी बुद्धि में अच्छी तरह से गणना करके में ब्रह्माजी की अनित्यता, भोगों की दोषयुक्तता तथा संसार की दुःखरूपता, मोक्ष की दुर्लभता, वैराग्य के कारण सांसारिक भोगों में दोष दृष्टि का होना, व्यक्त (महदादि विशेषान्त) तथा अव्यक्त प्रकृति का परित्याग करके परंबह्य में विद्यमान सत्त्व का मैं वर्णन करूंगा ॥३४-३५॥ भेदबुद्धि के ही कारण जीवों की भेद की ओर प्रवृत्ति होती है, उसके बाद जीव जिस तरह तापत्रय से रहित होकर सभी दोषों से रहित तथा संसार के विरूप हो जाता है इस बात का वर्णन मैं करूंगा इस तरह ब्रह्मानन्द को प्राप्ति कर लेने वाला जीव कहीं भी संसार के भय से भयभीत नहीं होता है, इस बात का वर्णन है । इस तरह से प्रमाणों के कृत्य का वर्णन किया गया है ॥३६॥ इस पुराण में जगत् की सृष्टि, प्रलय तथा विकारों का वर्णन किया गया है । इसमें जीवों की प्रवृत्ति तथा निवृत्तियों के फलों का वर्णन है ॥३७॥ महर्षि वसिष्ठ की उत्पत्ति तथा उनकी जन्म से ही स्वाभाविक शक्ति का वर्णन है । उनका सौदास के द्वारा तथा विश्वामित्र के द्वारा निग्रह ॥३८।( महर्षि पराशर की उत्पत्ति तथा पितरों की अदृश्यन्ती नामक कन्या के गर्भ से महर्षि व्यास की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है)।३९॥ उसके बाद महाबुद्धिमान् शुकदेवजी तथा उनके पुत्रों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है । महर्षि विश्वामित्र द्वारा किया गया महर्षि पराशर के विद्वेष का वर्णन किया गया है ॥४०॥ विश्वामित्र को मार देने की इच्छा से वसिष्ठ महर्षि द्वारा अग्नि की सृष्टि तथा उन दोनों में सन्धि करा देने के लिए ब्राह्मण तथा ब्राह्मण व्यतिरिक्त विश्वामित्र के हितैषी कण्व महर्षि के द्वारा उस अग्नि को शान्त कर दिये जाने का वर्णन है । इसके बाद एक ही चार चरणों वाले वेद का जिस प्रकार से महर्षि व्यास ने पुन: चार विभाग किया उसका वर्णन किया गया है । उसके पश्चात् उनके शिष्यों तथा प्रशिष्यों ने वेद की शाखाओं का विभाग किया इसका वर्णन है ॥४१-४२॥ उसके पश्चात् प्रयाग में श्रेष्ठ मुनियों ने भगवान् कृष्ण द्वैपायन

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