Srishti Khanda Extracted Page 33

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-33

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Sanskrit Original

त्रयोन्ये$ बु्धिूर्वास्ते तथालोकानकल्पयत् । ब्रह्मणो वदनेभ्यश्च भृग्वादीनां समुद्भवः ॥१७॥ कल्पयोरंतरं प्रोक्तं प्रतिसंधिश्च सर्गयोः। भृग्वादीनामृषीणां च प्रजासर्गोपवर्णनम् ॥१८॥ वसिष्ठस्य च ब्रह्ापेब्रहात्त्वं परिकीर्तितम् । स्वायंभुवस्य च मनोस्ततश्चाप्यनुकीर्तनम् ॥१९॥ ` उक्तो नाभेर्विसर्गश्च रजसश्च महात्मनः। द्वीपानां च समुद्राणां पर्वतानां च कीर्तनम्॥२०॥ द्वीपभेदसमुद्राणामन्तभावश्च सप्तसु । कीर्त्यन्ते योजनाग्रेण ये च तत्र निवासिनः॥२१॥ तदीयानि च वर्षाणि नदीभिःपर्वतैःसह। जंबूद्वीपादयो द्वीपाः समुद्रैः सप्तभिर्वृताः ॥२२॥ अंडस्यान्तस्त्विमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी । सूर्याचंद्रमसोश्चारो ग्रहाणां ज्योतिषां तथा ॥२३॥ कीर्त्यते ध्रुवसामर्थ्यात्प्रजानां च शुभाशुभम्। ब्रह्मणा निर्मितः सौरः स्यंदनोऽर्थवशात् स्वयम्॥२४॥ कल्पितो भगवांस्तेन प्रसर्पतिदिवाकरः । सूर्यादीनां स्यंदनानां ध्रुवादेव प्रवर्त्तनम्॥२५॥ कल्पितः शिशुमारश्च यस्य पुच्छे ध्रुवः स्थितः । संभवांते च संहारः संहारांते च संभवः ॥२६॥ देवतानामृषीणां च मनोः पितृगणस्य च । नशक्यं विस्तराहृक्तुमित्युक्तं च समासतः॥२७॥ अतीनागतानां वै समं स्वायम्भुवेन तु । मन्वंतरेषु देवानां प्रजेशानां च कीर्तनम् ॥२८॥ नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यंतिकः स्मृतः । त्रिविधः सर्वभूतानां कल्पितः प्रतिसंचरः॥२९॥ अनावृष्टिर्भास्कराच्च घोरः संवर्तकानलः । मेघाश्चैकार्णवा ये तु तथा रात्रिर्महात्मनः ॥३०॥ संघ्यालक्षणमुद्दिष्ट तथाब्राह्मंविशेषतः । भूतानां चापि लोकानां सप्तानामनुवर्णनम् ॥३१॥ अबुद्धि पूर्वक होने वाले दूसरे प्रकार के तीन प्रकार के प्रलय वर्णित है । उसके बाद ब्रह्माजी ने जो लोकों की कल्पना की उसका वर्णन है । फिर ब्रह्माजी के मुखों से भृगु आदि महर्षियों की उत्पत्ति का वर्णन है ॥१७॥ उसके बाद दो कल्पों में होने वाले अन्तराल का वर्णन है । इसके बाद दो सर्गो (सृष्टियों) की प्रति सन्धि का वर्णन है । फिर भृगु आदि ऋषियों की सन्तानों की सृष्टि का वर्णन है ॥१८॥ उसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मत्व का वर्णन है । उसके बाद स्वायम्भुव मनु का वर्णन है ॥१९॥ उसके बाद महात्मा नाभि तथा रजस के विसर्ग का वर्णन है । उसके बाद द्वीपों, समुद्रों तथा पर्वतों का वर्णन किया गया है ॥२०॥ सातों द्वीपों तथा सातो समुद्रों का वर्णन एवं उनका योजनों में परिमाण का वर्णन है #उसके बाद उन द्वीपों में निवास करने वाले जीवों का वर्णन है ॥२१॥ उन द्वीपों के नदियों तथा पर्वतों के साथ वर्षो का वर्णन किया गया है । जम्बूद्वीप आदि सातो द्वीप सात समुद्रों से घिरे हें ॥२२॥ इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्वर्ती लोकों, सात द्वीपों से युक्त पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहों तथा तारों आदि की गति का वर्णन किया गया है ॥२३॥ फिर ध्रुव के सामर्थ्य से प्रजाओं के होने वाले शुभ तथा अशुभ का वर्णन किया गया है । ब्रह्माजी ने स्वयम् प्रयोजनवशातू सूर्य के रथ को बनाया ।।२४॥ ब्रह्माजी के द्वारा निर्मित उस रथ से ही सूर्य सञ्चरण करते हैं । सूर्य इत्यादि ग्रहों के रथ ध्रुव के द्वारा ही प्रवर्तित होते हैं ॥२५॥ उसके बाद शिशुमार चक्र की कल्पना का वर्णन है । जिसके पूछ भाग में ध्रुव विद्यमान हैं । सृष्टि के अन्त में संहार होता है और संहार (प्रलय) के अन्त में सृष्टि होती है ॥२६॥ देवताओं, ऋषियों, मनुओं तथा पितृगणों का विस्तार से वर्णन नहीं किया जा सकता है इसीलिए इन सबों का संक्षेप में वर्णन किया गया है ॥२७॥ उसके बाद स्वायम्भुव मन्वन्तर से पहले के अतीतकालिक तथा अनागत (भविष्यत् कालिक) मन्वन्तरों के मनु, देवता तथा प्रजापतियों का वर्णन किया गया है॥२८॥ सभी भूतों के तीन प्रकार के प्रलय बतलाये गये है-- नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक ।।२९॥ उसके बाद अनावृष्टि, सूर्य से उत्पन्न होने वाली संवर्तकाग्नि तथा एकार्णव बना देने वाले मेघों तथा ब्रह्माजी की रात्रि का

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