Srishti Khanda Extracted Page 32
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-32
Sanskrit Original
ब्रह्मविष्णुगिरीशेभ्यो नमस्कृत्वा समाहितः। इंद्राय लोकपालेभ्यः सवित्रेच समाधिना ॥४॥ मुनीनांच वरिष्ठाय वसिष्ठाय महात्मने । तद्ठक्त्रे भाततपसे जातूकर्ण्याय चाक्षुषे ॥५॥ तस्मै भगवते नत्वा वेदव्यासाय वेधसे। पुरुषाय पुराणाय भृगुवाक्यानुवर्तिने॥६॥ तस्मादहमुपाश्रौष्रं पुराणं ब्रह्मवादिनः । सर्वज्ञात्सर्वलोकेषु पूजिताद्दीप्ततेजसः ॥७॥ अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् । महदादिविशेषांतं सृजती तिविनिश्चयः ॥८॥ अण्डे हिरण्मयेपूर्व ब्रह्मणः सूतिरुत्तमा । अण्डस्यावरणं चाद्धिरपामपि च तेजसः ॥९॥ वायुना तस्य वायोः खात्तद्धूतादित आवृतम्। भूतादिर्महता चापि अव्यक्तेनावृतो महान् ॥१०॥ प्रादुर्भावश्च लोकानामंड एवोपवणितः । नदीनां पर्वतानां च प््रादुर्भावोऽनुवर्ण्यते ॥९९॥ मन्वंतराणां संक्षेपातृकल्पानां चोपवर्णनम् । ब्रह्मवृक्षलयब्रह्मप्रजासर्गोपवर्णनम् ॥१२॥ कल्पानां संचरश्चैव जगतःस्थापनं तथा । शयनं च हरेरप्सु प्रथिव्युद्धरणं पुनः॥९३॥ दशधा जन्मसंचारो भृगुशापेन केशवे। सन्निवेशो युगादीनां सर्वाश्रमविभाजनम् ॥ ९ ४॥ स्वर्गस्थानविभागश्च मर्त्यानां स्वर्गचारिणाम् । पशूनां पक्षिणां चैव संभवः परिकीर्तितः ॥९५॥ तथानिर्वचनं कल्पं स्वाध्यायस्य परिग्रहः। प्रतिसर्गाः पुनः प्रोक्ता ब्रह्मणो बुद्धिपूर्वकाः ॥१६॥ ज्ञाता हैं । वे योग के वेत्ता हैं उन्होंने ही योग को अपनाकर इन समस्त चराचर जीवों की सृष्टि की है ॥२॥ पुराण की कथा को जानने की इच्छा वाला मैं उन्हीं, अज, सम्पूर्ण जगत् के स्रष्टा, सर्वज्ञ, लोकसाक्षी तथा व्यापक प्रभु की शरणागति करता हूँ ॥३॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सावधानी पूर्वक नमस्कार करके; देवराज इन्द्र को; समस्त लोकपालों को तथा भगवान् सूर्य को समाधि पूर्वक नमस्कार करके ॥४।। मुनियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ महर्षि को, उनको पुराणों का उपदेश करने वाले तपस्वी जातुकर्ण्य एवं चाक्षुष को एवं पुराणों की सृष्टि करने वाले महर्षि भृगु के वाक्यों का अनुसरण करने वाले पुराण पुरुष भगवान् व्यासजी को नमस्कार करके (मैं इस कथा को कह रहा हूँ) ॥५॥ उन्हीं ब्रह्मज्ञानी, सर्वज्ञ, समस्त लोकों में पूजित, महातेजस्वी वेदव्यासजी से मैंने पुराणों का श्रवण किया है ॥७॥ जो जगत् के उपादान कारण स्वरूप प्रकृति हैं, वह (प्रकृति ही) सदा चेतनाचेतनात्मक महत् तत्त्व से लेकर महाभूत पर्यन्त (समस्त प्राकृतिक तत्त्वों) की सृष्टि करती हैं । (उससे उत्पन्न हुए) हिरण्मय ब्रह्माण्ड में ब्रह्माजी की उत्तम सृष्टि हुयी। वह ब्रह्माण्ड जल के आवरण से आवृत है, उस जल के ऊपर तेज का आवरण है ॥९॥ वह तेज वायु के द्वारा आवृत है । वायु के ऊपर आकाश का आवरण है । वह भूतादि (तामस) अहङ्कार से आवृत है । भूतादि अहङ्कार महत् तत्त्व से आवृत है, और उस महत् तत्त्व के ऊपर अव्यक्त (प्रकृति) का आवरण है ॥१०॥ सभी लोकों की उत्पत्ति उस ब्रह्माण्ड में ही होती है उसी से नदियों और पर्वतों की भी उत्पत्ति बतलायी गयी है ॥११॥ उसके बाद इस पुराण में संक्षेप में मन्वन्तरों तथा कल्पों का वर्णन किया गया है । फिर ब्रह्मवृक्ष के लय का वर्णन किया गया है, ब्रह्माजी के द्वारा प्रजाओं की सृष्टि का वर्णन किया गया है ॥१२॥ कल्पों का प्रलय तथा जगत् की स्थापना का वर्णन किया गया है । श्रीहरि का एकार्णव में योगनिद्रा को अपना कर शयन करने का वर्णन है, फिर पृथिवी के उद्धार का वर्णन है ॥१३॥ महर्षि भृगु के शाप के कारण श्रीभगवान् के दश प्रकार से अवतार का वर्णन है । उसके बाद युगों आदि का वर्णन है, एवं समस्त आश्रमों के विभाग का वर्णन है ॥१४॥ स्वर्ग का तथा स्वर्ग में एवं मृत्युलोक में रहने वाले जीवों के स्थानों का वर्णन है । इस पुराण में पशुओं तथा पक्षियों की उत्पत्ति का वर्णन है ॥१५॥ उसके बाद निर्वचन के समान वेदाध्ययन का वर्णन है । उसके बाद बुद्धिपूर्वक ब्रह्मा जी का तीन प्रकार का प्रलय वर्णित है ॥१६॥ और
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