Srishti Khanda Extracted Page 31
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-31
Sanskrit Original
तृतीयपर्वग्रहणा राजानो भूरिदक्षिणाः । वंशानुचरितं चैव चतुर्थे परिकीर्तितम् ॥६२॥ पंचमे मोक्षतत्वं च सर्वतत्वं निगह्यते। पौष्करे नवधा सृष्टिः सर्वेषां ब्रह्मकारिता ॥६३॥ देवतानां मुनीनां च पितृसर्गस्तथापरः । द्वितीये पर्वताश्चैव द्वीपाः सप्तसागराः ॥६४॥ तृतीयेतरूद्रसर्गस्तु दक्षशापस्तथैव च। चतुर्थे संभवो राज्ञां सर्ववंशानुकीर्त्तनम्॥६५॥ अन्त्येपवर्गसंस्थानं मोक्षशासत्रा नुर्कात्तनम् । सर्वमेतत्पुराणेऽस्मित्कथयिष्यामि वो द्विजाः ॥६६॥ इद पवित्रं यशसो निधानमिदंपितृणामतिवल्लभं स्यात् । इदं च देवस्य सुखाय नित्यमिदं महापातकभिच्च पुंसाम् ॥६७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पुराणावतारे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ ae द्वितीय अध्याय सूत उवाच नमस्ये सर्वलोकानां विश्वस्य जगतः पतिम् । य इमं कुरुते भावं स्ृष्टिरूपं प्रधानवित् ॥९॥ लोककृल्लोकतत्त्वज्ञो योगमास्थाय योगवित्। असृजत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥२॥ तमजं विश्वकर्माणं चित्पतिं लोकसाक्षिणम् । पुराणाख्यानजिज्ञासुर्वजामि शरणं विभुम् ॥३॥ के वर्णन से संबद्ध दूसरा तीर्थ पर्व है ॥६१॥ तीसरे पर्व में बहुत अधिक दक्षिणा देने वाले राजाओं का वर्णन है । चौथे पर्व में वंशानुचरित का वर्णन है ॥६२॥ पाँचवाँ पर्व मोक्षपर्व है, उसी में सभी तत्त्वों का वर्णन है । पौष्कर पर्व मे ब्रह्माजी के द्वारा की गयी नव प्रकार की सृष्टियों का वर्णन है ॥६३॥ पहला सर्ग देवसर्ग है, दूसरा सर्ग मुनियों का सर्ग है । उसके बाद पितृसर्ग का वर्णन है । दूसरे पर्व में पर्वतों, द्रीपों तथा सात सागरों का वर्णन है ॥६४॥ तीसरे पर्व में रुद्र सर्ग का वर्णन तथा दक्ष के शाप का वर्णन है । चतुर्थ सर्ग में बड़े-बड़े राजाओं की उत्पत्ति का वर्णन है। तथा विभिन्न वंशों का वर्णन है।॥६५॥ अन्तिम पर्व में अपवर्ग उसके संस्थान तथा मोक्षशास्त्र का वर्णन है । हे ब्राह्मणों! इन सारी बातों को मैं इस पुराण में सुनाऊंगा ॥६६॥ यह पुराण अत्यन्त पवित्र है, यश का सागर है । यह पितृगणों को अत्यन्त प्रिय पुराण है । यह श्रीभगवान् को सदा सुख देने वाला है और यह पुरुषों के बड़े-से-बड़े पापों को विनष्ट करने वाला है ॥६७॥ इसतरह श्रीपद्महापुराण के सृष्टिखण्ड के पहले अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। १।। — He सृष्टिखण्ड की विषयानुक्रमणिका तथा भीष्म पुलस्त्य संवाद सूतजी ने कहा-- मैं सम्पूर्ण लोकों के स्वामी, जगतूपति श्रीभगवान् को नमस्कार करता हूँ । जो भगवान् प्रधानतत्व (प्रकृति तत्त्व) के वेत्ता हैं तथा जगत् की सृष्टि करने वाले हैं ॥१॥ जो लोकों के कर्त्ता हैं, लोकतत्त्व के
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