Srishti Khanda Extracted Page 30
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-30
Sanskrit Original
अंगानि चतुरो वेदाय्ुराणऱ्यायविस्तरम्। असुरेणाखिलं शास्त्रमपहृत्यात्मसात्कृतम् ॥४८॥ मत्स्यरूपेणाजहार कल्पादावुदकार्णवे। अशेषमेतदवददुदकांतर्गतो विभुः॥४९॥ श्रवा जगाद च मुनीग्रतिवेदांश्चतर्मुखः । प्रवृत्तिस्सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्तदा॥५ ०॥ कालेमाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य तदा विभुः । व्यासरूपस्तदा ब्रह्मा संग्रहार्थ युगे युगे॥५९॥ चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे जगौ। तदाष्टादशधा कृत्वा भूलोके स्मिनूप्रकाशितम् ॥५२॥ अद्यापि देवलोकेषु शतकोटिप्रविस्तरम्। तदेवात्र चतुर्लक्षं संक्षेपेण निवेशितम् ॥५३॥ प्रवक्ष्यामि महापुण्यं पुराणं पादाञ्ज्ितम् । सहस्त्रं पञ्चपञ्चाशत्पंचखण्डैस्समन्वितम् ॥५४॥ तत्रादौ सृष्टिखण्डं स्याद्धूमिखण्डं ततः परम्। स्वर्गखण्डं ततः पश्चात्तत पातालखण्डकम्॥५५॥ पञ्चमं चततः ख्यातमुत्तरं खण्डमुत्तमम् । एतदेवमहापद्ममुद्धूतं यन्मयं जगत् ॥५६॥ तद्वृत्तान्ताश्रयं यस्मात्यादममित्युच्यते ततः । एतत्पुराणममलं विष्णुमाहात्म्यनिर्मलम्॥५७॥ देवदेवो हरिर्यद्वै ब्रह्मणप्रोक्तवान्पुरा। ब्रह्मणाभिहितं पूर्व॑ यावन्मात्रं मरीचये ॥५८॥ एतदेव च वैब्रह्मापाद्ंलोके जगाद वै । सर्वभूताश्रयं तच्च पाद्ममित्युच्यते बुधैः ॥५९॥ पादं तत्पंचपंचाशत्सहस्राणीह पठ्यते । पंचभिः पर्वभिः प्रोक्तं संक्षेपाद्व्यासकारितात् ॥६०॥ पौष्करं प्रथमं पर्व यत्रोत्पन्नः स्वयं विराट् । द्वितीयं तीर्थपर्वस्यात्सर्वग्रहगणाश्रयम्॥६ १॥ किए (अर्थात् वेदों का प्रचार किए) ॥४७॥ छह वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द एवं ज्योतिष्) चारो वेदों, पुराणों तथा न्याय शास्त्र इत्यादि समस्त शास्रों को चुराकर हयग्रीव नामक अमुर पाताल लोक में चला गया।।४८॥ कल्प के प्रारम्भ में सर्वव्यापक श्रीभगवान् जल समुद्र में मत्स्य का रूप धारण करके उस राक्षस का वध करके सम्पूर्ण शास्रों को लाये तथा उसका उपदेश ब्रह्माजी को दिए ॥४९॥ श्रीभगवान् के मुख से वेदों का श्रवण करके ब्रह्माजी ने उसका उपदेश भिन्न-भिन्न मुनियों को दिया । उस समय से ही सभी शास्त्रों तथा पुराणों का प्रचार हुआ ॥५०॥ समयानुसार उस विस्तृत पुराण का श्रवण करना तथा अध्ययन करना; असंभव देखकर उसका विभाग करने के लिए श्रीभगवान् प्रत्येक द्वापर युग में व्यासजी के रूप से अवतीर्ण होते हैं ॥५१॥ प्रत्येक द्वापर में विस्तृत पुराण का चार लाख श्लोकों में संक्षेप करके तथा अठारह भागों में विभक्त करके इस भूलोक में व्यासजी प्रकाशन किया करते हैं ॥५२॥ इस समय भी देवताओं के लोकों में पुरण सौ करोड़ श्लोकों वाला है । उसी का इस भूलोक में व्यासजी ने चार लाख श्लोकों में संक्षेपण किया है ॥५३॥ मैं आपलोगों को पचपन हजार श्लोकों तथा पाञ्च खण्डों से युक्त अत्यन्त पवित्र पद्मपुराण को सुनाऊंगा ॥५४॥ इसका पहला खण्ड सृष्टिखण्ड है, दूसरा खण्ड भूमिखण्ड है, उसके बाद स्वर्गखण्ड है, इसका चतुर्थ खण्ड पातालखण्ड है ॥५५॥ इसका उत्तम पाञ्चवाँ खण्ड उत्तरखण्ड है । श्रीभगवान् की नाभि से महापडा उत्पन्न और उसी से यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ ॥५६। उस महापद्म के वृत्तान्त से सम्बद्ध होने के कारण इस पुराण का नाम पद्म पुराण है । इस निर्मल महापुराण में भगवान् विष्णु का निर्मल माहात्म्य वर्णित है ॥५७॥ देवदेव (देवाराध्य) श्रीहरि ने सर्वप्रथम इस पुराण का उपदेश ब्रह्माजी को दिया । उसके बाद ब्रह्माजी ने उसका उपदेश मरीचि महर्षि को दिया ॥५८॥ ब्रह्माजी ने सभी भूतों के आश्रय रूप से पद्मपुराण का ही लोक में उपदेश किया इसलिए विद्वान् लोग इसे पद्मपुराण कहते हैं ॥५९॥ इस पद्मपुराण के पचपन हजार श्लोक इस लोक में पढे जाते हैं । महर्षि व्यास के द्वारा संक्षिप्त किए जाने के कारण पाञ्च पर्वो में भी पढ़ा जाता है ॥६०॥ इसका पहला पर्व पौष्कर पर्व है, पुष्कर (कमल) पर ही विराद् की उत्पत्ति हुयी । इसका सभी ग्रहों
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