Srishti Khanda Extracted Page 29
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-29
Sanskrit Original
अधरोत्तरधारेण जज्ञे तद्वर्एसंकरम् । येत्र क्षत्रात्समभवन् ब्राह्मण्याश्चैव योनितः ॥३४॥ पूर्वेणैव तु साधम्यक्विधर्मास्ते प्रकीर्तिताः । मध्यमो होष सूतस्य धर्मः क्षेत्रोपजीविनः ॥३५॥ पुराणेष्वधिकारो मे विहितो ब्राह्मणैरिह । दृष्टवा धर्ममहं पृष्टो भवद्धिर्बरह्मवादिभिः ॥३६॥ तस्मात्सम्यग्भुवि ब्रूयां पुराणमृषिपूजितम् । पितृणां मानसी कन्या वासवं समपद्यत॥३७॥ अपध्याता च पितृभिर्मत्स्यगर्भे बभूव सा। अरणीव हुताशस्य निमित्तं पुण्यजन्मनः ॥३८॥ तस्यां बभूव पूतात्मा महर्षिस्तु पराशरात् । तस्मै भगवते कृत्वा नमः सत्यायवेधसे॥३९॥ पुरुषाय पुराणाय ब्रह्मवाक्यानुवर्तिने। मानवच्छद्मरूपाय विष्णवे , शंसितात्मने ॥४०॥ जातमात्रं च यं वेदउपतस्थे ससंग्रहः । मतिमंथानमाविध्य येनासौ श्रुतिसागरात्॥४ १॥ प्रकाशो जनितो लोके महाभारतचंन्द्रमाः । भारतं भानुमान्विष्णुर्यदि न स्युरमीत्रय: ॥४२॥ ततोऽज्ञानतमोंधस्य का वस्था जगतो भवेत्। कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्वि नारायणं प्रभुम् ॥४३॥ को ह्ान्यः पुंडरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् । तस्मादहमुपाश्रौषं पुराणं ब्रह्मवादिनः ॥४४॥ सर्वज्ञात्सर्वलोकेषु पूजिताददीप्ततेजसः । पुराणं सर्वशासत्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ॥४५॥ उत्तमं सर्वलोकानां सर्वज्ञानोपपादकम् । त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥४६॥ निःशेषु च लोकेषु वाजिरूपेण केशवः । ब्रह्मणस्तु समादेशाद्वेदानाहतवानसौ ॥४७॥ ee कट स स्त से उत्पन्न हुए थे । उसी से ऐन्द्र बार्हस्पत्य यज्ञ में सूत उत्पन्न हुए ॥३२-३४॥ पहले साधर्म्य (सदृशता) होने के कारण वे सूत जाति में उत्पन्न लोगों के लिए ये मध्यम कोटि के धर्म बतलाये गये हैं ॥३५॥ ब्राह्मणों ने मेरा पुराणों में अधिकार बतलाया है । आप सभी ब्रह्मवादी हैं । अतएव धर्म का विचार करके ही मुझे पुराण की कथा कहने को आपलोगों ने कहा है ॥३६॥ अतएव मैं पृथिवी पर ऋषियों द्वारा पूजित पुराण का अच्छी तरह से वर्णन करूँगा । पितरों की मानसिक पुत्री उपर्चिर॥३७॥ वसु के वीर्य में इसलिए प्रविष्ट हो गयी कि पितरों ने उसका अपध्यान किया था; वही उपरिचर वसु के तेज से उत्पन्न होने के कारण अरणि से उत्पन्न अग्नि के समान देदीप्यमान रूप से मत्स्या के गर्भ से उत्पन्न हुयी ॥३८॥ उस मत्स्यगर्भा के ही गर्भ से महर्षि पराशर के पुत्र तथा अत्यन्त पवित्र महर्षि व्यासजी - उत्पन्न हुए । उन सत्य स्वरूप तथा पुराणों के ख्रष्टा, पुराणपुरुष तथा ब्रह्मा के वाक्य का अनुवर्तनं करने वाले, भगवान् विष्णु के अंशावतार तथा श्लाघ्य, व्यासजी को नमस्कार करके, मैं आपलोगों को पुराणों की कथा को सुनाऊंगा ॥३९-४०॥ उपन्न होते ही व्यासजी को संग्रहों (अङ्गों और उपाङ्गों) के साथ वेद उपस्थित (ज्ञात) हो गये। उन्होंने अपनी बुद्धिरूपी मथानी से वेद रूपी सागर का मन्थन करके संसार में महाभारत रूपी चन्द्रमा का प्रकाश फैलाया । अर्थात् वेदों के सार रूप से महाभारत का निर्माण किया। महाभारत, सूर्य तथा भगवान् विष्णु यदि ये तीन नहीं होते ॥४१-४२॥ तो आज्ञानान्धकार से आवृत संसार की न जाने कौन सी अवस्था होती ?। कृष्णद्वैपायन व्यास को भगवान् नारायण ही जानना चाहिए॥४३॥ भगवान् पुण्डरीकाक्ष को छोड़कर महाभारत का रचयिता दूसरा कौन हो सकता है ? उन्हीं ब्रह्मज्ञानी के सन्निकट में, मैंने पुराणों का श्रवण किया है ॥४४॥ जो व्यासजी सर्वज्ञ, सम्पूर्ण लोकों में पूजित और महातेजस्वी हैं, उनकी ही सन्निधि में मैंने पुराणों का श्रवण किया है । ब्रह्माजी ने पुराण को समस्त शास्त्रा में प्रधान बतलाया है॥४५॥ यह सम्पूर्ण लोकों के विषय में सभी प्रकार के ज्ञानों को उपन्न करने वाला सर्वोत्तम साधन है । यह त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ एवं काम) की प्राप्ति का पवित्र साधन है । इसका विस्तार सौ करोड़ श्लोक परिमित है ॥४६॥ भगवान् केशव अश्व का रूप धारण करके सभी लोकों में ब्रह्माजी के आदेश से वेदों को समादूत
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