Srishti Khanda Extracted Page 28

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-28

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Sanskrit Original

इतिहासपुराणार्थव्यासः सम्यगुपासितः । दुदोहिथ मतिं तस्य त्वं पुराणाश्रयां शुभाम्॥२०॥ अमीषां विप्रमुख्यानां पुराणं प्रतिसम्प्रति । शुश्रूषाऽऽस्ते महाबुद्धे तछावयितुमर्हसि ॥२१॥ सर्वे हीमे महात्मानो नानागोत्राः समागतः। स्वन् स्वानंशाऱ्पुराणोक्ताञ्छृण्वन्तु ब्रह्मवादिनः ॥२२॥ संपूर्णे दीर्घसत्रेस्मिस्तांस्त्वं श्रावय वै मुनीन् । पादं पुराणं सर्वेषां कथयस्व महामते ॥२३॥ कथं पद्म समुद्धूतं ब्रह्मा तत्र कथंन्वभूत् । प्रोद्धतेन कथं सृष्टिः कृता तां तु तथा वद॥२४॥ एवं पृष्टस्ततस्तांस्तु प्रत्युवाच शुभां गिरम्। सूक्ष्मं च न्यायसंयुक्तं प््रात्रवीद्रौमहर्षणिः ॥२५॥ प्रीतोस्म्यनुगृहीतोस्मि भवद्धिरिहचोदनात् । पुराणार्थ पुराणज्ञैः सर्वधर्मपरायणैः ॥ २६॥ ` यथाश्नुतं सुविख्यातं तत्सर्वं कथयामि वः। धर्म एष तु सूतस्य सद्विर्दृष्टः सनातनः ॥२७॥ देवतानामृषीणां च राज्ञां चामिततेजसाम्। वंशानां धारणं कार्य स्तुतीनां च महामनाम्॥२८॥ इतिहासपुराणेषु दृष्टा ये ब्रह्मवादिनः । नहि वेदेष्वधिकारः कश्चित्सूतस्य दृश्यते ॥२९॥ वैन्यस्य हि पृथोर्यज्ञे वर्त्तमाने महात्मनः। मागधश्चैव सूतश्च तम स्तौतांनरेश्वरम् ॥३०॥ तुष्टेनाथ तयोर्दत्तो वरो राज्ञा महात्मना । सूताय सूतविषयो मगधो मागधाय च ॥३१॥ तत्र सूत्यां समुत्पन्नः सूतो नामेह जायते। ऐन्द्रे सत्रे प्रवृत्ते तु ` ग्रहयुक्ते बृहस्पतौ ॥३२॥ तमेवेंद्रं बार्हस्पतये तत्र सूतो व्यजायत । शिष्यहस्तेन यत्पृक्तमभिभूतं गुरोर्हविः ॥३३॥ वाले वे सभी महर्षियों से उनकी श्रद्धा का भाव जानकर सूतजी से कहे-- महाबुद्धिमान् सूतजी आपने ब्रह्मज्ञानियो में श्रेष्ठ ! भगवान् व्यासजी की अच्छी तरह से उपासना; इतिहास एवं पुराण का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया है और उनकी पुराण विषयिणी मङ्गलमयी बुद्धि का अच्छी तरह से आपने लाभ उठाया है ॥१९-२०॥ हे महाबुद्धे ! इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों की इस समय पुराणों की कथा को सुनने की इच्छा है, अतएव आप इन्हें उसे ही सुनाएँ ॥२१॥ अनेक गोत्रों के ये सभी महात्मा ब्राह्मण यहाँ पधारे हैं; अतएव ये सभी ब्रह्मवादी अपने-अपने वंश के विषय में पुराणों में वर्णित अंश का श्रवण करें ॥२२॥ इस सम्पूर्ण दीर्घसत्र में, हे महामते ! आप इन सबों को पद्मपुराण की कथा सुनायें ॥२३॥ पद्म कैसे उत्पन्न हुआ ? उस पर ब्रह्माजी किस प्रकार प्रकट हुए? उत्पन्न होकर उन्होने सृष्टि कैसे की? इन सारी बातों को आप इन लोगों को सुनायें ॥२४॥ इस प्रकार से पूछे जाने पर रोमहर्षण के पुत्र सूतजी सूक्ष्म अर्था से परिपूर्ण, सुन्दर न्याय युक्त वाणी में कहने लगे ।।२५॥ महर्षियों ! आपलोगों के पुराण विषयक प्रश्न को सुनकर मुझे बड़ी ही प्रसन्नता हुयी है। आपलोगों ने यह पूछ कर मुझे अनुगृहीत किया है । धर्म परायण तथा पुराणों के अर्थ को जानने वाले महापुरुषों से मैंने जैसा सुना है, उसी तरह से मैं उस पुराण के अर्थ को आपलोगों को सुनाऊ॑गा । सूतों का यही सनातन धर्म बतलाया है ॥२६-२७॥ कि वे ब्रहज्ञानी महापुरुषों, इतिहासों तथा पुराणों में जिनका वर्णन किया है उन देवताओं तथा निस्सीम तेज: सम्पन्न राजाओं की वंशपरम्परा को याद रखें और महापुरुषों की स्तुति करें । कहीं भी सूत जाति का वेदों में अधिकार नहीं बतलाया गया है ॥२८-२९॥ जिस समय वेन के पुत्र महाराज पृथु का ऐन्द्र याग हो रहा था, उसमें बृहस्पति स्वयं आचार्य थे । उसी समय सूत और मागध की उत्पत्ति हुयी। मागध तथा सूत इन दोनों ने महाराज पृथु की स्तुति की ॥३०॥ उससे प्रसन्न होकर महाराज पृथु ने वरदान के रूप में सूत को सूत देश प्रदान कर दिया और मागध को मगध देश का राज्य दे दिया ॥३१॥। क्षत्रिय के वीर्य से ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण इनका नाम सूत हुआ । गुरु का हविष्य शिष्य के हाथ से संपृक्त होकर नीचे तथा ऊपर के धार से गिरा, उसी से वर्णसङ्कर की उत्पत्ति हुयी । वे वर्णसङ्कर क्षत्रिय के वीर्य तथा ब्राह्मणी के गर्भ

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