Srishti Khanda Extracted Page 27

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-27

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Sanskrit Original

श्रीपयामहापुरण अनौपम्यमिदं चक्रं वर्तमानमतंद्रिताः। पृष्टतो यात नियमात्पदंप्राप््यथ यद्धितम् ॥७॥ गच्छतो धर्मचक्रस्य यत्रनेमिर्विशीर्यते। पुण्यः स देशो मंतव्य इत्युवाच स्वयंप्रभुः ॥८॥ उक्त्वा चैवमृषीन्सर्वानदृश्यत्वमगात्पुनः । गंगावर्तसमाहारो नेमि रत्र व्यशीर्यते ॥९॥ ईजिरे दीर्घसत्रेण ऋषयो नैमिषे तदा । तत्र गत्वा तु तान्त्रूहि पृच्छतो धर्मसंशयान् ॥१०॥ उग्रश्रवास्ततो गत्वा ज्ञानविन्मुनिपुंगवान्। अभिगम्योपसंगृह्ण नमस्कृत्वा कृतांजलिः ॥११॥ तोषयामास मेधावी प्रणिपातेन तानृषीन् । ते चापि सत्रिणः प्रीताः ससदस्या महात्मने॥१२॥ ऋषयऊचुः तस्मै समेत्य पूजा च यथावत्परतिपेदिरे । कुतस्त्वमागतः सूत कस्माद्देशादिहागतः॥१३॥ सूत उवाच कारणं चागमे ब्रूहि वृंदारकसमुद्युते । पित्राहं तु समादिष्टो व्यासशिष्येण धीमता ॥१४॥ शुश्रूषस्वमुनीन् गत्वा तत्ते पृच्छंति तह्ठद । वदंतु भगवंतो मां कथयामि कथां तु याम्॥१५॥ पुराणं चेतिहासं वा धमनिथ पृथग्विधान्। तां गिरं मधुरां तस्य शुश्रुवु ऋषिसत्तमाः ॥१६॥ अथ तेषां पुराणस्य शुश्रूषा समपद्यत । दृष्ट्वा तमतिविश्वस्तं विद्वांसं लौमहर्षणिम् ॥१७॥ तस्मिन्सत्रे कुलपतिस्सर्वशास्त्रविशारदः । शौनको नाम मेधावी ् विज्ञानारण्यके गुरुः॥१८॥ इत्थं तद्धावमालंब्य धर्माञ्छुश्रूषुराह तम् । त्वया सूत महाबुद्धे भगवान्त्रह्मवित्तमः॥९९॥ पवित्र देश (स्थान) को जानना चाहते थे । उन सबों से श्रीभगवान् ने कहा--- यह चक्र सुन्दर नाभि वाला तथा दिव्यरूप वाला है, यह सत्यगामी, कल्याणकारी विक्रम सम्पन्न तथा अनुपम है । आप सभी सावधानी पूर्वक तथा नियम का पालन करते हुए इसके पीछे-पीछे जायँ, ऐसा करने से आपलोग उस पवित्र स्थान को प्राप्त कर लेंगे ॥६-७॥ इस जाने वाले धर्म चक्र की नेमि जहाँ विशीर्ण हो जाय उसी को पवित्र स्थान मानना चाहिए ॥८॥ उन सभी ऋषयों से इस प्रकार कहकर श्रीभगवान् अन्तर्धान हो गये । उसके बाद वह धर्मचक्र गङ्गावर्त नामक स्थान पर गया और वहाँ वह नेमि शीर्ण होकर गिर पड़ा ॥९॥ उसके बाद ऋषियों ने वहाँ उस नैमिष क्षेत्र में दीर्घ सत्र के द्वारा श्रीभगवान् की आराधना प्रारम्भ की । तुम वहाँ पर जाकर उन ऋषियों के धर्म के विषय में होने वाले सन्देह को दूर करो॥१०॥ उसके बाद ज्ञान के स्वरूप को जानने वाले, उग्रश्रवा (सूतजी) उन श्रेष्ठ ऋषियो के पास गये । उनके पास जाकर उन्होंने उन ऋषियों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥११॥ मेधा सम्पन्न सूतजी ने साष्टाङ्ग प्रणाम करके उन ऋषियों को सन्तुष्ट किया । वे सत्रनिष्ठ महर्षिगण ने भी सदस्यों के साथ प्रसन्न होकर एक साथ महात्मा सूतजी की सविधि पूजा की । ऋषियों ने पूछा-- हे सूतजी ! आप यहाँ पर किस देश से आये हैं ? और किसलिए आये हैं ?॥१२-१३॥ हे देवताओं के समान कान्ति से सम्पन्न ! आप अपने आने का प्रयोजन बतलायें । सूतजी ने कहा--- व्यासजी के बुद्धिमान् शिष्य मेरे पिता (रोमहर्षण) ने मुझे आदेश दिया है कि तुम जाकर मुनियों की सेवा करो तथा वे जो पूछें, उन्हें बतलाओं । अतएव, हे ऐश्वर्यसम्पन्न मुनिजन ! आपलोग बतलाएँ कि मैं आपलोगों को कौन सी कथा सुनाऊं? १४-१५॥ पुराणों को ? या इतिहासों को ? या अनेक प्रकार के धर्मों को ? उन श्रेष्ठ ऋषियां ने सूतजी की उस मधुर वाणी को सुना ॥१६। उसके बाद रोमहर्षण सूत के पुत्र तथा विश्वस्त विद्वान् उग्रश्रवा सूतजी को देखकर उन लोगों की पुराण का श्रवण करने की इच्छा हुयी ॥१७॥ उस सत्र के कुलपति सभी शास्रं में निपुण शौनक महर्षि थे । वे मेधावी तथा विज्ञान रूपी आरण्यक भाग के प्रवक्ता थे ॥१८॥ धर्मो का श्रवण करने की इच्छा

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